बुधवार, 21 दिसंबर 2011

कला मेला की परंपरा







कला मेला  की परंपरा पुरानी रही है, परन्तु समय की व्यस्तताओं कों देखते हुए हम इससे दूर होते गए हैं अन्यथा समय और हुनर की पहचान तो मेलों से ही होती है, चित्रकला विभाग ऐसी गति विधियों कों लेकर व्यवहारिक प्रयोग करना आरम्भ किया है,जिसमें पिछले दिनों की गतिविधियाँ काफी चर्चा में रही हैं. उसी क्रम में हमने "कला मेला" का आयोजन किया है जिसका उद्येश्य नव वर्ष पर "ग्रीटिंग" हेतु छोटे छोटे कार्ड के आकार के हस्त निर्मित चित्र बच्चों ने तैयार किये हैं, और इस मेले में उन्होंने इन्ही चित्रों कों प्रदर्शित किया है |
आज के इस कला मेले का शुभारम्भ डॉ.आर एम्. जौहरी ने किया और इस अवसर पर डॉ. के.एन.आरोरा डॉ. लाल रत्नाकर एवं चित्रकला विभाग के छात्र छात्राओं ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की सुरुआत की. इसमे दिन भर महाविद्यालय के छात्र छात्राओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने छात्रों कों प्रोत्साहित किया |

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

"लघु कला मेला"


सुप्रिय मित्रों 
आपको सूचित करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि
चित्रकला के विद्यार्थी अपने बनाये लघु चित्रों का एक 
"लघु कला मेला" 
महाविद्यालय के मुख्य भवन के प्रांगन में कर रहे हैं 
दिनांक .२१ दिसंबर २०११  प्रातः ११ बजे 
जिसका शुभारम्भ 
प्राचार्य 
डॉ. आर -एम. जौहरी 
करेंगे 
कला मेला के उदघाटन कि 
अध्यक्षता विभाग के 
अध्यक्ष 
डॉ.लाल रत्नाकर 
करेंगे.
कृपया आप समय से उपस्थित होकर 
कार्यक्रम कि शोभा में अभीवृद्धि करें.

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

कितनी सार्थक हैं ये पंक्तियाँ -


अदम गोंडवी : दो गज़लें
जुलाई 9, 2008 
......................................................
एक
ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे

जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई
मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे ?

जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में
क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे ?

तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो
क्या द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे ?
.................................................
दो
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण , कोई शक , कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात , अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं ; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर , हलाकू , जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब ,क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग , मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त , मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

विश्वविद्यालय

(अमर उजाला से)

किसके भरोसे चल रहे हैं देश के ये विश्वविद्यालय

नई दिल्ली।
Story Update : Tuesday, December 13, 2011    2:18 AM
University of the trust who are running
देश में उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए भले ही सरकार भले ही तमाम दावे करे लेकिन आंकड़े बताते हैं कि स्थिति बदहाल हो चुकी है। इंटरमीडिएट के बाद कुल 15 फीसदी छात्र ही उच्च शिक्षा के लिए दाखिला ले पाते हैं। सरकार इसे ड्राप आउट की समस्या मानकर पल्ला झाड़ लेती है लेकिन विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी को भी इससे जोड़कर देखा जाना चाहिए।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 39 फीसदी से ज्यादा पद खाली हैं। इनको भरने के लिए भी केंद्र सरकार सीधी कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है। राज्यसभा में सांसद सत्यब्रत चतुर्वेदी द्वारा विश्वविद्यालयों में रिक्त पदों के बारे में पूछे एक सवाल के जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जो जवाब दिया है वह दीपक तले अंधेरा जैसी स्थिति दर्शाता है।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 16,948 शिक्षकों के स्वीकृत पदों में से 6620 खाली हैं। इसी तरह गैर शिक्षक कर्मचारियों के भी करीब 25 फीसदी यानी 8559 पद रिक्त हैं। राज्य सरकारों द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों के आंकड़े यद्यपि मानव संसाधन मंत्रालय के पास उपलब्ध नहीं है लेकिन सूत्रों का दावा है कि वहां स्थिति कहीं ज्यादा खराब है। पदों को भरे जाने के बारे में सीधे मानव संसाधन मंत्रालय ने यह कहते हुए दखल देने से इंकार किया है।

मंत्रालय के मुताबिक विश्वविद्यालय स्वायत्तशासी हैं इसलिए रिक्त पदों को यूजीसी के माध्यम से भरा जाना चाहिए। मानव संसाधन मंत्रालय ने शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए अवकाश प्राप्त करने वाले शिक्षकों को ही कांट्रैक्ट पर फिर से नियुक्त करने का भी सुझाव दिया है। यही नहीं ऐसे संस्थानों में शिक्षकों के अवकाश प्राप्त करने की उम्र भी बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी गई है।

डीयू में 50 फीसदी पद खाली
दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग पचास फीसदी अध्यापकों के पद इस समय खाली पड़े हैं। बाहरी राज्यों का हाल तो और भी खराब है। हरियाणा के गुरु घासीदास विवि में 75 फीसदी, इलाहाबाद विवि में 45 फीसदी, बनारस हिंदू विवि में 35 फीसदी, केंद्रीय विवि बिहार में 86 फीसदी, केंद्रीय विवि गुजरात में 80 फीसदी, केंद्रीय विवि हरियाणा में 89 फीसदी, केंद्रीय विवि हिमाचल प्रदेश में 88 फीसदी, केंद्रीय विवि कश्मीर में 91 फीसदी, केंद्रीय विवि केरल में 94 फीसदी तथा केंद्रीय विवि पंजाब में 84 फीसदी शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। मानव संसाधन मंत्रालय के अनुसार, यहां शिक्षकों के पद उनके रिटायर होने, इस्तीफा देने, मौत होने या डेपुटेशन पर चले जाने से खाली हुए हैं।

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

पद्मश्री श्री राम वी सुतार


अरे! इतने गांधी बनाए हैं मैंने...

Story Update : Saturday, December 10, 2011    8:33 PM
i have made so many Gandhi
देश के किसी भी शहर में अगर गांधी जी की मूर्ति दिखे, तो गौर से उस पर खुदे हुए हस्ताक्षर देखिएगा। 75 प्रतिशत संभावना इस बात की है कि वह हस्ताक्षर मूर्तिकार राम सुतार का हो। राम सुतार ने तमाम महापुरुषों की मूर्तियां बनाई हैं, लेकिन वे कहते हैं कि आज भी सबसे ज्यादा मांग गांधी की ही है।

राम वी. सुतार का नाममूर्ति कला में रुचि रखने वालों के लिए किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 19 फरवरी 1925 को महाराष्ट्र के धूलिया जिले में जन्मे राम सुतार को उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। लेकिन उनका मानना है कि वे उस समय अपने को ज्यादा सम्मानित महसूस करते हैं, जब उनकी बनाई मूर्ति को देखकर लोग कहते हैं कि वाह क्या बात है! उन्हें इस बात का भी सुकून है कि उन्होंने अपनी मूर्तियों के जरिए देश विदेश में जगह-जगह गांधी को पहुंचा दिया है। हाल ही में वे लंदन टूर करके लौटे हैं। उनसे एक बातचीतः

हाल में ही आप कलाकारों के एक समूह के साथ लंदन का टूर करके लौटे हैं। क्या वहां के कलाजगत पर भी मंदी का कुछ असर दिख रहा है?
हम नौ आर्टिस्ट थे। हम देश के अलग-अलग प्रांतों से थे। हमने वहां के कला परिदृश्य का जायजा लिया। वहां दो जगह हमारी प्रदर्शनी लगी और एक फाउंड्री में मैंने कास्टिंग भी की। वहां के हालात देखकर लगा कि मंदी का असर वहां के कला जगत पर भी पड़ रहा है।

खबर है कि आप गांधी और आइंस्टाइन की जगुलबंदी पर कोई कंपोजीशन बना रहे हैं?
हां, न्यूजीलैंड से इस संबंध में एक अनूठा ऑफर मिला है। उन्हें एक कंपोजीशन चाहिए, जिसमें गांधी जी चरखा चला रहे हैं और आइंस्टाइन बैठे लिख रहे हैं। इसे वे ऐसी जगह लगाना चाहते हैं, जहां तमाम पर्यटक इन दोनों विश्व-विभूतियों को एक साथ देख सकें।

आपने तमाम महापुरुषों की मूर्तियां बनाई हैं। सबसे ज्यादा मांग किसकी मूर्तियों की होती है?
सबसे ज्यादा मूर्तियां मैंने गांधी की बनाई हैं। दुनिया के लगभग हर देश में उनकी मांग है।

देश-विदेश में आपकी बनाई हुई कितनी गांधी-प्रतिमाएं लगी होंगी?
भारत से बाहर करीब 70 देशों में मेरी बनाई हुई मूर्तियां लगी हुई हैं। दिल्ली में संसद भवन, गांधी स्मृति और राजघाट के अलावा देश के लगभग सभी राज्यों में, सभी प्रमुख शहरों में मेरे बनाए गांधी लगे हुए हैं।

अब तक का सबसे बड़ा स्कल्पचर आपने किसका बनाया है?
सबसे बड़ी मूर्ति चंबल नदी की है। 45 फीट ऊंची यह मूर्ति कोटा के पास है, जहां गांधी सागर बांध बना है। पहले वहां बांध बनाने को लेकर मध्यप्रदेश और राजस्थान में विवाद था। मैंने चंबल को मां के रूप में दिखाया और मध्यप्रदेश व राजस्थान को उसके बच्चों के रूप में दिखाया। नेहरू जी उद्घाटन के लिए आए, तो उन्हें यह आइडिया बहुत पसंद आया। इसके अलावा कुरुक्षेत्र में लगी कृष्ण-अर्जुन संवाद की प्रतिमा भी काफी विशाल है। यह 60 फीट लंबी और 35 फीट ऊंची है। इस प्रतिमा को बनाने से पहले मैंने गीता का गहन अध्ययन किया, ताकि उसके संदेश को सही तरीके से मूर्तिवंत कर सकूं। मैं जिस भी पर्सनैलिटी की प्रतिमा बनाता हूं, उसके व्यक्तित्व के एक-एक पहलू का अध्ययन करता हूं, ताकि प्रतिमा में उसका व्यक्तित्व झलक सके।

आपके बनाए हुए नवीनतम मूर्तिशिल्प कहां इंस्टॉल किए गए हैं?
नोएडा के दलित प्रेरणा स्थल में मेरे बनाए 9 मूर्तिशिल्प लगे हैं। इनमें दलित नायकों-चिंतकों के जीवन चरित हैं।

ऐसा कौन सा ड्रीम प्रोजेक्ट है, जिसे आप अभी पूरा नहीं कर सके हैं?
बचपन में मैं चाहता था कि एक ऐसी हनुमान प्रतिमा बनाऊं, जिसके हृदय में विराजित राम, लक्ष्मण और सीता लाइफ साइज के हों। अभी मेरा सपना है कि मैं दुनिया का सबसे ऊंचा स्कल्पचर बनाऊं। यह स्कल्पचर गांधी जी का होगा। और स्टेच्यू आफ लिबर्टी की तरह इसमें एक संदेश भी होगा। इसमें गांधीजी दो वंचित बच्चों के साथ होंगे, जो शांति और सामाजिक न्याय का प्रतीक होगा। इसके अलावा मैं एक मान्यूमेंट प्रगति का भी बना चाहता हूं, जिसमें मनुष्याकृतियों का एक पिरामिड होगा, जो आकाश छूने को ललक रहा है। अगर कोई मुझे जगह और संसाधन उपलब्ध करा दे, तो मैं इन पर काम करना चाहता हूं।

आपने विचारों की बात की। ललित कला में विचार की कितनी अहमियत है।
विचारों के बिना कला वैसी ही है, जैसे सुगंध के बिना फूल। जैसे प्राण के बिना शरीर।

कलाकार में जन्म से ही नैसर्गिक प्रतिभा होती है, या शिक्षा देकर कलाकार बनाया भी जा सकता है?
देखिए हर व्यक्ति में बचपन से ही किसी चीज की ओर स्वाभाविक रुझान होता है। अच्छा शिक्षक उसके रुझान को भांपकर उसकी प्रतिभा को निखारता है। साथ ही व्यक्ति की निजी साधना भी उसकी प्रतिभा को निखारती है।

आपने पहला स्कल्पचर कब बनाया था?
बचपन में पहला स्कल्पचर बिच्छू का बनाया था। एक मरे हुए बिच्छू को साबुन की टिकिया पर चिपकाकर मैंने उसका छाप लिया था।

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

"मेरी बात"

दूरदर्शन के लाइव प्रसारण "मेरी बात" कार्यक्रम में शिरकत करने गए एम्.एम.एच. कालेज के छात्र छात्राएं एवं प्राध्यापक गण जिसे डी डी भारती पर ४-३० से ५-३० तक लाइव प्रसारित किया गया २९ नवम्बर २०११ को जिसमे  विभिन्न विभागों से ५२ छात्र छात्राएं तथा ७ प्राध्यापक एवं १ परिचर शिरकत करने गए . इस कार्य क्रम का विषय नशा था .

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

क्या वास्तव में एसा कर पायेंगें नए उप कुलपति -

"विवेचक"
यद्यपि  प्राचार्य के रूप में सफल होना और  उप कुलपति के रूप में सफल होने में बहुत फर्क होता है. क्योंकि बहुत सरे असफल प्राचार्यों की कार्य प्रणाली पर भी जिम्मेदारी होती है उप कुलपति की.
जिस अराजकता का हवाला देकर प्रोफ.गुप्ता ने विश्वविद्यालय छोड़ा है वह कल्पना से परे ही है आज जहाँ दुनिया बदलाव के माहौल में अपनी समस्यायों जूझ रही हो उससे निकालने का रास्ता तलास रही हो नए रास्ते तलासने में व्यस्त हो वहां जिस कुलपति ने शिक्षा के आंगन में 'गुंडों' की भरमार का नज़ारा देखा हो, वहीँ अब एक एसे कालेज के वरिष्ठतम प्राचार्य यह दायित्व संभालने जा रहे हैं देखिये इनकी कथनी और करनी का फार्मूला कितना कामयाब होता है-

कथनी और करनी में नहीं होगा फर्क : डा. विपिन

Sep 23, 09:49 pm
मेरठ : चौ. चरण सिंह विवि के नव नियुक्त कुलपति डा. विपिन गर्ग के पास लगभग 20 बरस का शिक्षण संस्थान चलाने का प्रशासनिक अनुभव है। बतौर शिक्षक भले ही वे 19 बरस रहे, लेकिन एक कामयाब कालेज प्राचार्य का उनका 21वां बरस चल रहा है। सीसीएस विवि के अधीन आने वाले कालेजों के वे सबसे वरिष्ठ प्राचार्य हैं। राजभवन ने उनकी इन्हीं योग्यताओं का आकलन करने के बाद सीसीएसयू की कमान उन्हें सौंपी है। डा. विपिन गर्ग ने पदभार संभालने के साथ ही विवि में प्रशासनिक और अकादमिक सुधार को दिशा देने के इरादे स्पष्ट कर दिये।
विशेष बातचीत...
प्रश्न : लंबे अरसे तक प्राचार्य रहने के बाद कुलपति का दायित्व मिलने के बाद आपकी क्या प्राथमिकताएं रहेंगी?
डा. गर्ग - राजभवन ने फिलहाल 6 माह के लिए सीसीएसयू के कुलपति का पदभार दिया है। विवि की शैक्षणिक गतिविधियों को सुदृढ़ करने के साथ प्रशासनिक तालमेल बेहतर करना पहली प्राथमिकता होगी।
प्रश्न : माना जाता है कि सीसीएसयू के कुलपति का पद बेहद चुनौती भरा होता है, ऐसे में आपकी कार्यशैली क्या रहेगी?
डा. गर्ग - किसी भी प्रशासनिक पद की तरह विवि के कुलपति की सफलता इस बात पर निहित करती है कि कथनी और करनी में फर्क न हो। किसी भी विवाद को बढ़ाने या खत्म करने में संवादहीनता की मुख्य भू्मिका रहती है। मेरा प्रयास रहेगा कि छात्र, शिक्षक, गैर शिक्षक, छात्र संगठनों के साथ बेहतर संवाद कर प्रशासनिक हल निकाले जाएंगे।
प्रश्न : विवि में छात्र संगठनों का दबदबा और दो माह से पनपे हालत का आपको क्या समाधान लगता है?
डा. गर्ग- पहले चीजों को समझना होगा। अगर छात्रों की कोई समस्याएं हैं तो उसका हल बातचीत कर हो सकता है। उनकी जायज समस्याओं का समाधान जल्द करने से उनका विश्वास प्रशासन पर बढ़ता है। मैं बातचीत का पक्षधर हूं। पूर्व कुलपति ने विवि में पुलिस बेरिकेडिंग आदि जो फैसले लिये हैं उनका प्रशासनिक पक्ष देखने के बाद अगला फैसला लिया जाएगा।
प्रश्न : हाल में विवि में कई प्रशासनिक गड़बड़ियां हुई और उनकी जांच में शिथिलता के आरोप लगते रहे उनसे कैसे निपटा जाएगा
डा. गर्ग- मेरे संज्ञान में ऐसे मामले हैं जिनको लेकर जांच चल रही है। जिन भी मामलों की जांच कमेटियां गठित हुई हैं उनकी रिपोर्ट आने में हो रही देरी के कारणों की समीक्षा कर जो आवश्यक कार्यवाही है वो की जाएगी।
प्रोफाइल
मूल निवासी- नगीना, जिला बिजनौर
एमएससी बॉटनी - सीसीएसयू देहरादून
पीएचडी - धारवाड़ (कर्नाटक)
पोस्ट डॉक्टरेट -पीयू चंडीगढ़
1972- 91 - बॉटनी विभागाध्यक्ष केएल डीएवी कालेज रुड़की
एआइसीटी सलाहकार समिति सदस्य 1997-98
1991 से 2011- प्राचार्य आइपी कालेज बुलंदशहर।
एक एसे कालेज के वरिष्ठतम प्राचार्य निश्चित रूप से यहाँ की तकनीक समझते हैं यहाँ के छात्रों की राजनीती से वह वाकिफ होंगे यहाँ के नेताओं पर भी उनकी पकड़ होगी, शिक्षक नेताओं के वह संरक्षक रहे होंगें, विश्वविद्यालय कर्मचारियों से उनका पाला पड़ा होगा एक एक के सुकर्म और कुकर्मों से भलीभांति वाकिफ होंगे पर क्या सचमुच सब एक दिन में जादुई छड़ी जैसा बदल जायेगा या गहरे कहीं दब जायेगा क्योंकि वह एक सफल प्रिंसिपल रहे हैं .
डॉ. तनेजा लगभग इन्ही विशेषतायों को रखते थे, लेकिन क्या हुआ उनके साथ और तो और विश्वविद्यालय की राजनीती और कालेज से गया हुआ प्रिंसिपल जिन्हें युनिवेर्सिटी का एक एक चपरासी तक जानता है. निश्चित रूप से वह सफल हो जाएंगे यदि वह अपने यहाँ के चापलूस अध्यापकों की नियति जैसा आकलन कर चला पाए तो पर वह तो विश्वविद्यालय है और यहाँ जमावड़ा होगा ही नानाप्रकार के तत्वों का 'शिक्षा माफियायों का और नेताओं और उनकी नियति की कीमत वसूलने वाले कार्यकर्ताओं का.
फिर भी विश्वविद्यालय आस लगाये बैठा है एसे किसी कर्मठ उप कुलपति का जो इसे सुधार सके. आशा है गर्ग साहब को यह सुयश जाये. 

क्या होगा इस विश्वविद्यालय का ?


विवि की राजनीति में फेल हुई आइआइटी Sep 23, 09:50 pm

मेरठ : चौ. चरण सिंह विवि में अब तक आइआइटी से दो प्रोफेसर कुलपति नियुक्ति हो चुके हैं। आइआइटी प्रोफेसर भले ईमानदार साबित हुए, लेकिन विवि की राजनीति को पार नहीं पा सके। सीसीएसयू की शैक्षिक गतिविधियों को बेहतर बनाने के उनकी कोशिशें यहां के कर्मचारियों, प्राइवेट कालेजों और छात्र नेताओं की परंपरागत कार्यशैली के सामने हार गई। राजभवन को त्यागपत्र देकर आइआइटी वापस लौटने में प्रोफेसरों ने भलाई समझी। वहीं गैर आइआइटी कुलपति यहां कामयाब रहे हैं भले ही उनके दामन दागदार रहे। बीते एक दशक में गैर आइआइटी कुलपति या तो विजिलेंस जांच में फंसे हुए हैं या भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी हैं।
प्रो. एचसी गुप्ता का कार्यभार संभालने के दो महीने बाद ही इस्तीफा देना इस बात को और पुख्ता करता है। प्रो. गुप्ता ने आने के बाद स्थितियों को नियंत्रित करने की जो भी कोशिश की उसका नतीजा उलटा आया। दो महीने में छात्र, शिक्षक-गैरशिक्षक और प्राइवेट कालेजों की राजनीति में उन्हें लगा कि वे इसे निभा नहीं पाएंगे। उन्होंने त्यागपत्र वापस लेने से बेहतर आइआइटी वापसी को तरजीह दी। इससे पहले प्रो. डीके तिवारी इसी तरह बीच में कार्यकाल छोड़ गए थे। जनवरी, 98 में प्रो. तिवारी चौ. चरण सिंह विवि में कुलपति के तौर पर पहुंचे। वे भी प्रो. गुप्ता की तरह ही आइआइटी दिल्ली के फिजिक्स विभाग से ही थे, लेकिन डेढ़ वर्ष में ही पदभार छोड़ गए।
बाकी दामन में दाग लेकर लौटे
प्रो. तिवारी और प्रो. गुप्ता के बीच जितने भी स्थाई कुलपति आए वे भले अपना समय पूरा कर गए, लेकिन उनके दामन पर गंभीर दाग लगे हुए हैं। प्रो. तिवारी ने केसी पांडे से चार्ज लिया था, जिन्हें विजिलेंस जांच झेलनी पड़ी। प्रो. रमेश चंद्रा सीबीआई जांच झेल रहे हैं। उनके बाद रामपाल सिंह के खिलाफ दो जांच चल रही हैं। प्रो. ओझा सीडी कांड की भेंट चढ़े। प्रो. गुप्ता से पहले स्थाई कुलपति प्रो. काक का श्रीटॉन मामले में भू्मिका पर सवाल उठता है।

मिलिट्री ही है भ्रष्ट छात्र नेताओं का इलाज

Sep 24, 02:27 am
मेरठ : पूर्व कुलपति प्रो. गुप्ता अब भी यही मानते है कि मिलिट्री की तैनात ही सीसीएसयू जैसे विश्वविद्यालयों को सुधार सकती है। त्याग पत्र मंजूर होने के बाद उन्होंने कहा कि राजभवन को उन्होंने मिलिट्री की मांग से अवगत करवाया था। मेरठ विवि का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यहां के छात्र नेता हैं। उन्होंने छात्र नेताओं के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली। छात्र नेताओं के साथ स्थानीय राजनेताओं को भी उन्होंने नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि विवि के कर्मचारी और अधिकारियों में इक्का-दुक्का ही भ्रष्ट हो सकते हैं, लेकिन यह छात्र नेता विवि को गर्त में ले जा रहे हैं।
चार माह में चौथे कुलपति
उनसे पुलिस की सुरक्षा दिये जाने के सवाल पर प्रो. गुप्ता ने कहा कि पुलिस लगाने से कौन सी व्यवस्था में सुधार आया। गुंडागर्दी जस की तस रही। छात्र नेता अपनी मनमानी चलाते रहे। उन्होंने कहा कि छात्र नेता पूरे सिस्टम को भ्रष्ट कर रहे हैं, अगर उनपर रोक नहीं लगी तो विवि की हालत दयनीय हो जाएगी। उनसे सिस्टम सुधारने के तरीके के बारे में उनका कहना था कि छात्र नेता पर रोक लगा दीजिए सिस्टम खुद ब खुद सुधर जाएगा। उन्होंने कहा कि स्थानीय नेताओं के इशारे पर छात्र राजनीति चलती है, जिसके तार एडमिशनों से जुड़े हैं। शिक्षा सुधार नहीं निजी लाभ के नाम पर असमाजिक तत्व छात्र नेता बने हुए हैं। पूर्व कुलपति ने कहा कि उन्होंने अपनी तरफ से प्रयास किये और राजभवन को सारी व्यवस्था से अवगत करवाया, लेकिन स्थितियां नहीं सुधरी। ऐसे में त्यागपत्र वापस लेने का सवाल ही खड़ा नहीं होता था।

Sep 23, 09:50 pm
मेरठ : डा. विपिन गर्ग बीते चार माह में विवि के चौथे कुलपति नियुक्त हुए हैं। विवि की मौजूदा व्यवस्था को संभालने में अंदर बाहर दोनों ही जगह से आए कुलपति कामयाब नहीं रहे हैं।
26 मई 2011 को प्रो. एनके तनेजा का कुलपति पद हटाया कर राजभवन ने प्रो. एके बक्शी को पदभार सौंपा। प्रो. बक्शी के पास एक माह पद रहा और 1 जुलाई को राजभवन ने आइआइटी दिल्ली के प्रो. एचसी गुप्ता को नियुक्त किया। प्रो. गुप्ता ने दो माह बाद एक सितंबर को राजभवन को त्याग पत्र भेज दिया। राजभवन ने 23 दिन तक मंथन के बाद प्रो. गुप्ता का त्यागपत्र मंजूर कर सीसीएसयू के वरिष्ठ प्राचार्य डा. विपिन गर्ग को 6 माह के लिए कुलपति नियुक्ति कर दिया। विवि के शीर्ष प्रशासनिक पद पर बार-बार हो रहा फेरबदल से संस्थान की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़ा कर रहा है। चार माह से चल रही फेरबदल से यह भी सवाल उठ रहा है कि कुलपति बदलने के साथ विवि की भीतर घर कर चुकी राजनीति का हल क्या है।
पिछले एक दशक में कुलपति का कार्यकाल
प्रो. रमेश चंद्रा 2 मार्च, 2000 से 1 मार्च, 2003
प्रो. आरपी सिंह 2 मार्च, 2003 से 27 जून, 2005
मोहिंदर सिंह 28 जून 2005 से 28 नवंबर, 2005
प्रो. एसपी ओझा 29 नवंबर, 2005 से 4 नवंबर, 2008
प्रो. एसवीएस राणा 5 सितंबर, 2008 से 9 सितंबर, 2008
प्रो. एसके काक 10 सितंबर, 2008 से 4 नवंबर, 2010
प्रो. एनके तनेजा 5 नवंबर, 2010 से 26 मई, 2011
प्रो. एके बक्शी 27 मई, 2011 से 30 जून, 2011
प्रो. एचसी गुप्ता 1 जुलाई, 2011 से 23 सितंबर, २०११
(दैनिक जागरण से साभार)



सोमवार, 19 सितंबर 2011

शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार


शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार


http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2011/09/110919_shaharyar_audio_new_akd.shtml
 सोमवार, 19 सितंबर, 2011 को 19:48 IST तक के समाचार
शहरयार ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले चौथे शायर हैं
अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान 'शहरयार' को रविवार को साल 2008 के साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया.
उन्हें ये सम्मान उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए दिया गया है. हिंदी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन ने दिल्ली के सिरीफ़ोर्ट ऑडिटोरियम में हुए 44वें ज्ञानपीठ समारोह में उन्हें ये पुरस्कार प्रदान किया.
1936 में उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मे शहरयार उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं, जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है.
उनसे पहले फिराक़ गोरखपुरी, कुर्रतुल एन हैदर और अली सरदार जाफ़री को ये सम्मान दिया गया है.
शहरयार को 1987 में उनकी रचना ''ख़्वाब के दर बंद हैं'' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था.
ज्ञानपीठ सम्मान मिलने से ठीक पहले बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत में शहरयार ने बेहद ख़ुशी जताते हुए विनम्रता से कहा कि उन्हें कभी-कभी हैरानी होती है कि बिना ज़्यादा प्रयत्न किए इतने बड़े-बड़े सम्मान कैसे मिल गए.
शहरयार का जन्म उस समय हुआ था जब भारत में प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

योगदान

1936 से लेकर वर्तमान समय तक उर्दू शायरी ने देश की बदलती परिस्थितियों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी है जिसमें शहरयार की क़लम का भी अहम योगदान रहा है.
देश, समाज, सियासत, प्रेम, दर्शन - इन सभी को अपनी शायरी का विषय बनाने वाले शहरयार बीसवीं सदी में उर्दू के विकास और उसके विभिन्न पड़ावों के साक्षी रहे हैं.
आमतौर पर उर्दू शायरी को मुशायरों से जोड़कर देखा जाता है लेकिन शहरयार इसे ठीक नहीं मानते.
उनका कहना है कि देश और दुनिया में जो बदलाव हुए हैं वो सब किसी न किसी रूप में उर्दू शायरी में अभिव्यक्त हुए हैं और वो उनकी शायरी में भी नज़र आता है.
शहरयार की शायरी न तो परचम की तरह लहराती है और न ही कोई एलान करती है वो तो बस बेहद सहजता से बड़ी से बड़ी बात कह जाती है.
शहरयार ने मुश्किल से मुश्किल बात को आसान उर्दू में बयां किया है क्योंकि उनका मानना है कि जो बात वो कहना चाहते हैं वो पढ़नेवाले तक सरलता से पहुंचनी चाहिए.

समझ

शहरयार ने भारतीय सियासत और उसके चरित्र को बख़ूबी समझा है. अपनी एक ग़ज़ल में कहते हैं -
तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या
कि तुमने चीख़ों को सचमुच सुना नहीं है क्या
तमाम ख़ल्क़े ख़ुदा इस जगह रुके क्यों हैं
यहां से आगे कोई रास्ता नहीं है क्या
लहू लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को
किसी को ख़ौफ़ यहां रात का नहीं है क्या
शहरयार इन पंक्तियों के माध्यम से ये कहना चाह रहे हैं कि लोग या तो सियासी चालों को समझ नहीं पा रहे या फिर समझकर भी अनजान बने हुए हैं. अगर ऐसा है तो ये बेहद ख़तरनाक बात है.
शहरयार ने उमराव जान, गमन, अंजुमन जैसी फ़िल्मों के गीत लिखे जो बेहद लोकप्रिय हुए. हालांकि वो ख़ुद को फ़िल्मी शायर नहीं मानते.
उनका कहना है कि अपने दोस्त मुज़फ़्फ़र अली के ख़ास निवेदन पर उन्होंने फ़िल्मों के लिए गाने लिखे हैं.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू के प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए शहरयार 75 साल के हो गए हैं लेकिन उनकी लेखनी अब भी थमी नहीं है.
वक़्त और बदलते हालात को आज भी वो अपनी शायरी में पिरो कर अभिव्यक्त कर रहे हैं और उर्दू के भविष्य को लेकर बेहद आशान्वित हैं.
उनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के बावजूद हिंदी और उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं का भविष्य बहुत उज्ज्वल है.