मेरठ : चौ. चरण सिंह विवि में अब तक आइआइटी से दो प्रोफेसर कुलपति नियुक्ति हो चुके हैं। आइआइटी प्रोफेसर भले ईमानदार साबित हुए, लेकिन विवि की राजनीति को पार नहीं पा सके। सीसीएसयू की शैक्षिक गतिविधियों को बेहतर बनाने के उनकी कोशिशें यहां के कर्मचारियों, प्राइवेट कालेजों और छात्र नेताओं की परंपरागत कार्यशैली के सामने हार गई। राजभवन को त्यागपत्र देकर आइआइटी वापस लौटने में प्रोफेसरों ने भलाई समझी। वहीं गैर आइआइटी कुलपति यहां कामयाब रहे हैं भले ही उनके दामन दागदार रहे। बीते एक दशक में गैर आइआइटी कुलपति या तो विजिलेंस जांच में फंसे हुए हैं या भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी हैं।
प्रो. एचसी गुप्ता का कार्यभार संभालने के दो महीने बाद ही इस्तीफा देना इस बात को और पुख्ता करता है। प्रो. गुप्ता ने आने के बाद स्थितियों को नियंत्रित करने की जो भी कोशिश की उसका नतीजा उलटा आया। दो महीने में छात्र, शिक्षक-गैरशिक्षक और प्राइवेट कालेजों की राजनीति में उन्हें लगा कि वे इसे निभा नहीं पाएंगे। उन्होंने त्यागपत्र वापस लेने से बेहतर आइआइटी वापसी को तरजीह दी। इससे पहले प्रो. डीके तिवारी इसी तरह बीच में कार्यकाल छोड़ गए थे। जनवरी, 98 में प्रो. तिवारी चौ. चरण सिंह विवि में कुलपति के तौर पर पहुंचे। वे भी प्रो. गुप्ता की तरह ही आइआइटी दिल्ली के फिजिक्स विभाग से ही थे, लेकिन डेढ़ वर्ष में ही पदभार छोड़ गए।
बाकी दामन में दाग लेकर लौटे
प्रो. तिवारी और प्रो. गुप्ता के बीच जितने भी स्थाई कुलपति आए वे भले अपना समय पूरा कर गए, लेकिन उनके दामन पर गंभीर दाग लगे हुए हैं। प्रो. तिवारी ने केसी पांडे से चार्ज लिया था, जिन्हें विजिलेंस जांच झेलनी पड़ी। प्रो. रमेश चंद्रा सीबीआई जांच झेल रहे हैं। उनके बाद रामपाल सिंह के खिलाफ दो जांच चल रही हैं। प्रो. ओझा सीडी कांड की भेंट चढ़े। प्रो. गुप्ता से पहले स्थाई कुलपति प्रो. काक का श्रीटॉन मामले में भू्मिका पर सवाल उठता है।
Sep 24, 02:27 am
चार माह में चौथे कुलपति
उनसे पुलिस की सुरक्षा दिये जाने के सवाल पर प्रो. गुप्ता ने कहा कि पुलिस लगाने से कौन सी व्यवस्था में सुधार आया। गुंडागर्दी जस की तस रही। छात्र नेता अपनी मनमानी चलाते रहे। उन्होंने कहा कि छात्र नेता पूरे सिस्टम को भ्रष्ट कर रहे हैं, अगर उनपर रोक नहीं लगी तो विवि की हालत दयनीय हो जाएगी। उनसे सिस्टम सुधारने के तरीके के बारे में उनका कहना था कि छात्र नेता पर रोक लगा दीजिए सिस्टम खुद ब खुद सुधर जाएगा। उन्होंने कहा कि स्थानीय नेताओं के इशारे पर छात्र राजनीति चलती है, जिसके तार एडमिशनों से जुड़े हैं। शिक्षा सुधार नहीं निजी लाभ के नाम पर असमाजिक तत्व छात्र नेता बने हुए हैं। पूर्व कुलपति ने कहा कि उन्होंने अपनी तरफ से प्रयास किये और राजभवन को सारी व्यवस्था से अवगत करवाया, लेकिन स्थितियां नहीं सुधरी। ऐसे में त्यागपत्र वापस लेने का सवाल ही खड़ा नहीं होता था।
Sep 23, 09:50 pm
मेरठ : डा. विपिन गर्ग बीते चार माह में विवि के चौथे कुलपति नियुक्त हुए हैं। विवि की मौजूदा व्यवस्था को संभालने में अंदर बाहर दोनों ही जगह से आए कुलपति कामयाब नहीं रहे हैं।
26 मई 2011 को प्रो. एनके तनेजा का कुलपति पद हटाया कर राजभवन ने प्रो. एके बक्शी को पदभार सौंपा। प्रो. बक्शी के पास एक माह पद रहा और 1 जुलाई को राजभवन ने आइआइटी दिल्ली के प्रो. एचसी गुप्ता को नियुक्त किया। प्रो. गुप्ता ने दो माह बाद एक सितंबर को राजभवन को त्याग पत्र भेज दिया। राजभवन ने 23 दिन तक मंथन के बाद प्रो. गुप्ता का त्यागपत्र मंजूर कर सीसीएसयू के वरिष्ठ प्राचार्य डा. विपिन गर्ग को 6 माह के लिए कुलपति नियुक्ति कर दिया। विवि के शीर्ष प्रशासनिक पद पर बार-बार हो रहा फेरबदल से संस्थान की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़ा कर रहा है। चार माह से चल रही फेरबदल से यह भी सवाल उठ रहा है कि कुलपति बदलने के साथ विवि की भीतर घर कर चुकी राजनीति का हल क्या है।
पिछले एक दशक में कुलपति का कार्यकाल
प्रो. रमेश चंद्रा 2 मार्च, 2000 से 1 मार्च, 2003
प्रो. आरपी सिंह 2 मार्च, 2003 से 27 जून, 2005
मोहिंदर सिंह 28 जून 2005 से 28 नवंबर, 2005
प्रो. एसपी ओझा 29 नवंबर, 2005 से 4 नवंबर, 2008
प्रो. एसवीएस राणा 5 सितंबर, 2008 से 9 सितंबर, 2008
प्रो. एसके काक 10 सितंबर, 2008 से 4 नवंबर, 2010
प्रो. एनके तनेजा 5 नवंबर, 2010 से 26 मई, 2011
प्रो. एके बक्शी 27 मई, 2011 से 30 जून, 2011
प्रो. एचसी गुप्ता 1 जुलाई, 2011 से 23 सितंबर, २०११
(दैनिक जागरण से साभार)
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