परिसर से मुकुल जैनी
(गाजियाबाद) जहाँ एक और तमाम पुराने छात्रों के फोन और मैसेजेज (SMS) शिक्षक दिवस पर शुभ कामनाएं दे रहे हों वहीँ एमएमएच कॉलेज में समाजशास्त्र के प्रोफेसर डा. एके जैन कहते हैं कि जब पिता-पुत्र के संबंध बदल गए हैं, तो गुरु-शिष्य के संबंधों में भी बदलाव स्वाभाविक है। टीचर और स्टूडेंट के बीच कमिटमेंट खत्म हो रहा है। शिक्षक और शिष्य दोनों को अपनी गरिमा और एक-दूसरे के सम्मान का ख्याल रखना होगा तभी गुरु-शिष्य की परंपरा आगे भी बरकरार रहेगी। (बकौल अमर उजाला-०६-०९-२०११)
विकास की धारा में अशोक जी को छात्रों की गरिमा का विल्कुल ख्याल नहीं है, यह दौर विकासशील तथ्यों आधारित और सरकारी नीतियों में बदलाव के चलते जो वर्ग आगे आ रहा है, आश्चर्य है कि बदलाव की इस प्रक्रिया में खामियां ही खामियां नज़र आ रही हैं जबकि हम पुराने ख्यालों में जिन्दा हैं और छठे वेतनमान की खामियां ढूढ़ने में मशगुल हैं. आज महाविद्यालयों का सच तो यह है कि यहाँ ७० से ८० प्रतिशत विद्यार्थी 'दलित और पिछड़े' वर्ग से आ रहा है, स्वाभाविक है एकलव्य का स्मरण हो आना और गुरु शिष्य की परंपरा में भी खामियां नज़र आना. हम स्वाभाव से उदार और मृदुभाषी तो हैं पर गुरु द्रोण की परंपरा कैसे छोड़ें.
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