(रविवार से साभार-)
लो, वो दिखाई पड़े हुसैन
अखिलेश
1.
मैं ख़ामोश कदम की आहट हूं, कान धरो तो सुन पाओ.
मैं ख़ामोश कदम की आहट हूं, कान धरो तो सुन पाओ.
मक़बूल फ़िदा हुसैन (बाबा) से मिलना पूरी एक सदी से मिलने जैसा है. उनके साथ अनेकों मुलाक़ातें हैं. इन मुलाक़ातों की बहुत सी स्मृतियाँ हैं, जिनमें उनके काम करने के ढँग आदि भी याद आते हैं. वे ज़्यादातर समय अपने कामों में मुब्तिला रहते. शायद ही कोई मुलाक़ात ऐसी हो जब वे चित्र बनाते हुए न मिले हों या ऐसी एक दोपहर या शाम या सुबह न गुज़री हो, जिसमें उन्होंने चित्र न बनाया हो. यह सोच पाना असम्भव-सी बात लगती रही है कि वे चित्र नहीं बना रहे हैं. वे जब ‘गजगामिनी’ बना रहे थे, तब भी सेट पर एक स्टूडियो बना रखा था, जहाँ वे शूटिंग के बीच चित्र बनाने का समय निकाल लेते थे. अन्य चित्रकारों के साथ मेरा जो अनुभव रहा है, उसमें सभी का काम करने का जुदा ढँग है. हुसैन एकदम निराले हैं. उन्होंने अपने को पूरी तरह से चित्र बनाने के लिए समर्पित किया हुआ है. वे एक सच्चे, सुलझे और सम्पूर्ण चित्रकार हैं.
एक चित्रकार के बतौर मेरा उनके साथ 1974 से संबंध बनना शुरू हुआ, वे इन्दौर आए हुए थे. मैं महाविद्यालय में पढ़ रहा था. हमें पता चला हुसैन साहब इन्दौर में हैं. हमने आनन-फानन एक समूह चित्र-प्रदर्शनी आयोजित करने की योजना बनायी और इसके उद्घाटन के लिए हुसैन को आमन्त्रित किया. उनका आकर्षक व्यक्तित्व और सम्मोहक उपस्थिति हमारे लिए इस प्रदर्शनी को एक यादगार घटना में बदल कर चली गयी. उनकी उपस्थिति दोनों तरह से एक साथ है-आप उन्हें इन्सान और कलाकार की तरह अलगा नहीं सकते. वे बेहतर इन्सान होने के साथ साथ विलक्षण चित्रकार हैं. आपको दोनों हमेशा साथ ही देखने को मिलते हैं. वे प्रदर्शनी के उद्घाटन के तत्काल बाद कह सकते हैं कि चलिए, हम लोग चाय पीने चलते हैं. बम्बई बाज़ार की कोई एक छोटी-सी चाय की दुकान, उनके ज़माने के दिनों की चाय की दुक़ान वहाँ ढूँढेंगे-खोजेंगे, पाएँगे और हम लोग चाय पीएँगे. वापस प्रदर्शनी में लौट आएँगे. इस तरह का उनका व्यक्तित्व है, जिसमें कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं है और सभी का महत्त्व है. उनकी उपस्थिति शालीन, शाईस्ता और बहुत ही ज़िंदा है. हर पल धड़कती हुई. हर पल उसमें कुछ न कुछ अनपेक्षित हो रहा है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती.
एक और बार, कॉलेज में अचानक वे आए और उन्होंने महाविद्यालय को एक चित्र बनाकर देने की इच्छा ज़ाहिर की. ताबड़तोड़ हम लोगों ने एक कैनवास जुटाया. हुसैन ने चित्र बनाना शुरू किया. चित्र उन्होंने कैनवास के निचले हिस्से से शुरू किया. उनके आकारों में श्रृंगारिक भाव/erotic feeling था/थी. बन रहा चित्र कामोत्तेजक नज़र आ रहा था. धीरे धीरे वह पूरा होता गया. पता चला, गणेश का चित्र है. उस चित्र में ज़रा भी उत्तेजकता नहीं थी. मगर उनकी approach व चित्र बनाने की शुरुआत ऐसी थी, जिस पर किसी को भी लग सकता था कि ये क्या बना रहे हैं. यह हुसैन ही हैं जो इस तरह से अपने चित्रों की कल्पना कर पाते हैं. वे कहीं से भी शुरू कर कहीं भी ले जा सकते हैं. वे कोई भी आकार-प्रकार, रंग, रेखा को किसी भी रूप में बदलने की क्षमता रखते हैं. ऐसे अनेकानेक क़िस्से हैं जो हर मुलाक़ात पर नये तरह से घटित होते हैं. नये ढँग से हुसैन के बारे में पता चलता है. तब यह जान पाते हैं कि रचनात्मकता का कोई बना-बनाया स्वरूप नहीं है. इस वक्त भी पिचानवें साल की उम्र में वे जिस स्फूर्ति व गति से चित्र बना रहे हैं, वह साधारण तौर पर किसी चित्रकार के लिए सम्भव नहीं है. मेरे लिए तो बिल्कुल सम्भव नहीं है. यह करिश्मा हुसैन के भीतर ही है. उन्हीं के लिए है. इस उम्र में उनकी स्मृति, विनोदप्रियता पूर्ववत् है, वैचारिक प्रखरता मजबूत है, उसे हिलाया नहीं जा सकता. विचारों का साझा ज़रूर कर सकते हैं, पर वे बदले नहीं जा सकते.
2.
अपने आरम्भिक दिनों में हुसैन को लेकर मन में दो तरह के प्रभाव थे. एक- उन्हें ख्यातनाम चित्रकार की तरह जानने का था, दूसरा यह कि वे हमेशा नंगे पैर चलते हैं. यह अपने में विरोधाभासी बात थी. इन बातों से उनके प्रति एक आकर्षण मन में था. जब उन्हें हुसैन की तरह जानने लगा तब वे एक रोज़ घर आये. मैंने सबसे पहले उनके पैर ही देखे कि उन्होंने चप्पल पहने हैं या नहीं. उनके पैर नंगे थे. उसके बाद मैं अपने मित्रों सहित इन्दौर में उनके साथ तीन दिन तक लगातार घूमता रहा था. हम लोग चप्पल, जूते पहने रहते थे मगर वे सहज ही बिना चप्पल या जूतों के रहते. उस वक्त उनके चप्पल न पहनने को लेकर एक और घटना हुई. वे पद्मश्री लेने राष्ट्रपति के सामने बग़ैर चप्पल पहने चले गये थे. प्रेस ने हल्ला मचाया कि यह आचार संहिता के ख़िलाफ़ है. राष्ट्रपति का अपमान है. वग़ैरह. हमें बाद में पता चला कि उन्होंने सन् 1964 में मुक्तिबोध की शवयात्रा में चप्पल पहनना हमेशा के लिए त्याग दिया था. मुक्तिबोध के साथ उनकी दोस्ती का संबंध था, उन्होंने मित्र की याद में एक चीज़ छोड़ दी थी. कभी इस पर पलट कर विचार नहीं किया. एक बार उन्होंने एक खेल किया. यह क़िस्सा उन्होंने मुझे सुनाया, ‘‘मैंने एक दिन एक पैर में सफ़ेद जूता पहना दूसरे में काला और अपने सारे चित्रकार मित्रों के घर गया. किसी ने भी ध्यान नहीं दिया. जाते वक्त मुझे ही बताना पड़ता था कि देखो, मैंने जूते पहने है. एक काला, एक सफ़ेद.’’ इसके पीछे उनका विनोदी स्वभाव भी काम कर रहा था. क़िस्से में मज़ेदार बात यह है कि वे जिन के घर गये, वे सब चित्रकार थे, जिनके लिए ‘देखना’ महत्त्व रखता है और किसी ने भी देखा नहीं. इनमें हमारे ख्यातनाम चित्रकार भी हैं.
वे क़िस्सागोई में माहिर हैं. यह भी एक क़िस्सा सा बन जाता है, जब वे सफ़ेद-काला जूता पहन सबके घर चले जाते हैं. हुसैन अगर एक बड़े चित्रकार नहीं होते तो निश्चित बड़े लेखक होते. क़िस्सागोई में उनकी अपनी रुचि है. वे उसे अपने ढँग से बुनते और सँवारते हैं. ऐसे बहुत सारे पोस्टकार्ड्स उन्होंने अपने दोस्तों को लिखे हैं, जिसमें वे एक क़िस्से को बयां कर रहे हैं. दोस्तों को लिखे इन पोस्टकार्ड में शब्द ही नहीं, चित्र भी होते हैं.
3.
उन दिनों हम महाविद्यालय में पढ़ रहे थे. इच्छा यह होती थी कि आगे जाकर हुसैन जैसा ही मुकाम हासिल हो. वे प्रेरणा-स्त्रोत भी थे. आदर्श भी. उन्हीं दिनों हमारा ध्यान उनके चित्रों की तरफ़ जाना शुरू हुआ. उनके चित्र हिन्दुस्तानी साँस्कृतिक पृष्ठभूमि से उपजे थे. उन दिनों चित्रों की गहराई को हम लोग नहीं समझ पाते थे लेकिन उनका आकर्षक व्यक्तित्व हम पर हावी रहता था. चित्र हम लोग देखते थे और न समझते हुए वापस देखते थे. बस देखा करते थे. उन्हें ध्यान से देखना ही काम था. मेरे घर में उनकी दो-तीन किताबें थी. उनकी शुरुआती किताबें. उसमें उनके रेखांकन, कोलाज, चित्र आदि थे.
मैंने कभी उन चित्रों की नक़ल करने का प्रयास नहीं किया. उनके चित्रों की रेखाओं और उनके बारे में जो पढ़ाया जाता था, उस सबसे प्रभावित होता था, लेकिन ऐसा कभी नहीं लगा कि उनके चित्रों की नक़ल करनी चाहिए जबकि मेरे साथ के बहुत सारे मित्र और हमारे पहले के चित्रकार मित्र सब हुसैन की भरपूर नक़ल करते थे. हुसैन के बनाये घोड़े चित्रकला संसार में प्रसिद्ध थे.
इन्दौर में चित्रकारों की अच्छी खासी संख्या थी, जो सिर्फ़ घोड़े ही बनाते थे और हुसैन साहब की हूबहू नक़ल करने की कोशिश करते थे या उनसे थोड़ा बहुत हट कर बनाने की कोशिश करते थे, किन्तु वे बनाते घोड़े ही थे. ज़ाहिर है कि ये घोड़े उनके अपने देखे हुए घोड़े नहीं थे, इसलिए वे मरे हुए घोड़े ही बने रहते. हुसैन के चित्रों में घोड़ों की ऊर्जा, स्फूर्ति और उनका विशिष्ट ढँग का चित्रण अत्यन्त आकर्षक था. हुसैन के घोड़ों की चित्रात्मकता उनके साँस्कृतिक सन्दर्भों से ओत-प्रोत थी.
हुसैन के चित्रों में घोड़ों की शुरुआत इन्दौर में मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले ताज़ियों में सबसे आगे चलने वाले ‘दुलदुल’ घोड़े से होती है. घोड़ा उन के लिए गहरी आस्था के साथ ही साँस्कृतिक प्रतीक भी था. घोड़े के ऊपर शक्ति इत्यादि के अन्य चस्पां मूल्य भी इसमें शामिल थे. हुसैन का घोड़ा समुद्र मंथन से निकला ‘उच्चैश्रवा’ भी था और ‘दुलदुल’ भी. जबकि अन्य चित्रकारों के घोड़े हुसैन के घोड़ों की नक़ल मात्र थे. इसलिए वे एकदम बेदम थे. उन दिनों हुसैन का एक वाक्य हमें बहुत ही अच्छा लगता था. किसी ने उनसे पूछा, ‘‘आजकल आप क्या कर रहे हैं” वे बोले, ‘‘मैं घोड़े बेच कर सो रहा हूँ.’’
इन दिनों हुसैन की उपस्थिति हमें ज़्यादा आकर्षक लगती थी, बजाय उनकी रचनात्मक उपस्थिति के. रचनात्मक उपस्थिति पर हमारा ध्यान पहली बार उस वक्त गया, जब टाटा संस्थान से एक किताब छप कर इन्दौर कला महाविद्यालय में आई. यह किताब सम्भवतः हुसैन ने ही भिजवायी होगी अपने महाविद्यालय के लिए.
हमारे महाविद्यालय के प्रधानाध्यापक चन्द्रेश सक्सेना ने हम कुछ विद्यार्थियों को अपने कमरे में बुलाया और यह किताब दिखाई. वह एक खासी मोटी किताब थी. हम उस मोटी किताब के आकर्षण में ही उस किताब को देख रहे थे. एक के बाद एक चित्र और छाया-चित्रों से गुज़रते हुए ‘between spider and lamp’ नामक चित्र आया. सक्सेना सर ने हमें थोड़ा बहुत उसके बारे में बतलाया कि यह हुसैन का महत्त्वपूर्ण चित्र है और इसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है.
हम लोगों ने थोड़ी देर उसे देखा. यह ध्यान से देखना हमारे किसी काम का नहीं था. हम लोग नहीं जानते थे कि क्या देख रहे हैं. हम लोगों को यह भी नहीं पता था कि यह वह चित्र है जिसने हिन्दुस्तान की समकालीन कला की धारा तय की है. हमने पन्ना पलटना चाहा. सक्सेना सर ने कहा-ध्यान से देखें, इस चित्र में गाली लिखी हुई है. चित्र में ऊपर की तरफ़ कुछ अक्षर और संकेत चित्रित थे. हमने सोचा कि इतना बड़ा चित्रकार इसमें गाली क्यों लिखेगा. फिर उस गाली ढूँढ़ने के उत्साह में चित्र को ध्यान से देखना शुरू किया.
यह नियम-सा बन गया था कि सुबह महाविद्यालय आते और सक्सेना सर के कमरे में जाकर उस चित्र को देखते हुए उसमें अलिखित गाली ढूँढ़ते. गाली ढ़ूँढ़ने में इस चित्र से मेरा एक संबंध बनने लगा. उस चित्र में वे संकेत दिखाई देने लगे जो हुसैन को हुसैन की तरह स्थापित करते थे. हुसैन की चित्र-भाषा स्पष्ट होने लगी. मैं कभी उस चित्र में गाली नहीं ढूँढ़ पाया. वह चित्र मेरी स्मृति में बस गया था.
बरसों बाद हुसैन से इस पर बात हुई. मैंने कहा, ‘‘उस चित्र में ऊपर की ओर आपने कुछ अक्षर लिखे हैं और सक्सेना सर का कहना है कि आपने गाली लिखी है. आप ने क्या लिखा है? ”
उन्होंने कहा, ‘‘उस वक्त मेरी तीन प्रेमिकाएँ थी, उनके नाम के प्रथम अक्षर हैं.’’ उस चित्र में वे महज़ उनकी प्रेमिकाओं के प्रथम अक्षर नहीं बल्कि संकेत थे. स्वामी कहते थे कि चित्र में कोई भी संकेत, संकेत भर नहीं रह जाता वह प्रतीक बन जाता है. वे प्रतीक बन चुके अक्षर थे. इस तरह के वहाँ चार-पाँच संकेत हैं, जो प्रतीक बन जाते हैं. यहाँ से एक संबंध हुसैन के चित्रों के साथ बनना शुरू हुआ, जो गहराता गया. लगातार हुसैन की मौजूदगी से और मेरे पिता जो बतलाते थे उससे. यह दिखाई देना शुरू होने लगा कि हुसैन की इन आकृतियों का गहरा संबंध भारतीय शिल्प से है. गुप्त काल की मूर्तियों और चोला धातु शिल्प से है. भारतीय समकालीन लोक सँस्कृति से और कला की शुरुआत से है. आधुनिकता और भारतीय परम्परा से है.
मेरे साथ उनका संबंध गहराने के दो कारण हैं. वे मेरे पिता के अच्छे मित्र थे. दूसरा जब भी उनसे मिलना हुआ है बातचीत का विषय समकालीन चित्रकला संसार ही रहा है. किन्हीं दीगर चीज़ों में मेरी दिलचस्पी न होने के कारण मैं उनसे हमेशा उन विषयों को लेकर बात करता रहा हूँ, जो मेरी अपनी समझ में चित्रकला के लिए महत्त्वपूर्ण हैं. मैंने कभी उनसे उन विवादों को लेकर बात नहीं की या इस तरह के विषयों को लेकर बात नहीं की जो फौरी हैं व कुछ समय बाद ग़ायब हो जाने वाले हैं. एक तरह की रचनात्मक बातचीत में ही उनके साथ सारा समय सुधरा है. कभी ऐसा नहीं हुआ कि समय काटने के लिए समय गुज़ारा हो.
4.
A painter is surrounded by forms, natural and mechanical,
उन दिनों हम महाविद्यालय में पढ़ रहे थे. इच्छा यह होती थी कि आगे जाकर हुसैन जैसा ही मुकाम हासिल हो. वे प्रेरणा-स्त्रोत भी थे. आदर्श भी. उन्हीं दिनों हमारा ध्यान उनके चित्रों की तरफ़ जाना शुरू हुआ. उनके चित्र हिन्दुस्तानी साँस्कृतिक पृष्ठभूमि से उपजे थे. उन दिनों चित्रों की गहराई को हम लोग नहीं समझ पाते थे लेकिन उनका आकर्षक व्यक्तित्व हम पर हावी रहता था. चित्र हम लोग देखते थे और न समझते हुए वापस देखते थे. बस देखा करते थे. उन्हें ध्यान से देखना ही काम था. मेरे घर में उनकी दो-तीन किताबें थी. उनकी शुरुआती किताबें. उसमें उनके रेखांकन, कोलाज, चित्र आदि थे.
मैंने कभी उन चित्रों की नक़ल करने का प्रयास नहीं किया. उनके चित्रों की रेखाओं और उनके बारे में जो पढ़ाया जाता था, उस सबसे प्रभावित होता था, लेकिन ऐसा कभी नहीं लगा कि उनके चित्रों की नक़ल करनी चाहिए जबकि मेरे साथ के बहुत सारे मित्र और हमारे पहले के चित्रकार मित्र सब हुसैन की भरपूर नक़ल करते थे. हुसैन के बनाये घोड़े चित्रकला संसार में प्रसिद्ध थे.
इन्दौर में चित्रकारों की अच्छी खासी संख्या थी, जो सिर्फ़ घोड़े ही बनाते थे और हुसैन साहब की हूबहू नक़ल करने की कोशिश करते थे या उनसे थोड़ा बहुत हट कर बनाने की कोशिश करते थे, किन्तु वे बनाते घोड़े ही थे. ज़ाहिर है कि ये घोड़े उनके अपने देखे हुए घोड़े नहीं थे, इसलिए वे मरे हुए घोड़े ही बने रहते. हुसैन के चित्रों में घोड़ों की ऊर्जा, स्फूर्ति और उनका विशिष्ट ढँग का चित्रण अत्यन्त आकर्षक था. हुसैन के घोड़ों की चित्रात्मकता उनके साँस्कृतिक सन्दर्भों से ओत-प्रोत थी.
हुसैन के चित्रों में घोड़ों की शुरुआत इन्दौर में मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले ताज़ियों में सबसे आगे चलने वाले ‘दुलदुल’ घोड़े से होती है. घोड़ा उन के लिए गहरी आस्था के साथ ही साँस्कृतिक प्रतीक भी था. घोड़े के ऊपर शक्ति इत्यादि के अन्य चस्पां मूल्य भी इसमें शामिल थे. हुसैन का घोड़ा समुद्र मंथन से निकला ‘उच्चैश्रवा’ भी था और ‘दुलदुल’ भी. जबकि अन्य चित्रकारों के घोड़े हुसैन के घोड़ों की नक़ल मात्र थे. इसलिए वे एकदम बेदम थे. उन दिनों हुसैन का एक वाक्य हमें बहुत ही अच्छा लगता था. किसी ने उनसे पूछा, ‘‘आजकल आप क्या कर रहे हैं” वे बोले, ‘‘मैं घोड़े बेच कर सो रहा हूँ.’’
इन दिनों हुसैन की उपस्थिति हमें ज़्यादा आकर्षक लगती थी, बजाय उनकी रचनात्मक उपस्थिति के. रचनात्मक उपस्थिति पर हमारा ध्यान पहली बार उस वक्त गया, जब टाटा संस्थान से एक किताब छप कर इन्दौर कला महाविद्यालय में आई. यह किताब सम्भवतः हुसैन ने ही भिजवायी होगी अपने महाविद्यालय के लिए.
हमारे महाविद्यालय के प्रधानाध्यापक चन्द्रेश सक्सेना ने हम कुछ विद्यार्थियों को अपने कमरे में बुलाया और यह किताब दिखाई. वह एक खासी मोटी किताब थी. हम उस मोटी किताब के आकर्षण में ही उस किताब को देख रहे थे. एक के बाद एक चित्र और छाया-चित्रों से गुज़रते हुए ‘between spider and lamp’ नामक चित्र आया. सक्सेना सर ने हमें थोड़ा बहुत उसके बारे में बतलाया कि यह हुसैन का महत्त्वपूर्ण चित्र है और इसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है.
हम लोगों ने थोड़ी देर उसे देखा. यह ध्यान से देखना हमारे किसी काम का नहीं था. हम लोग नहीं जानते थे कि क्या देख रहे हैं. हम लोगों को यह भी नहीं पता था कि यह वह चित्र है जिसने हिन्दुस्तान की समकालीन कला की धारा तय की है. हमने पन्ना पलटना चाहा. सक्सेना सर ने कहा-ध्यान से देखें, इस चित्र में गाली लिखी हुई है. चित्र में ऊपर की तरफ़ कुछ अक्षर और संकेत चित्रित थे. हमने सोचा कि इतना बड़ा चित्रकार इसमें गाली क्यों लिखेगा. फिर उस गाली ढूँढ़ने के उत्साह में चित्र को ध्यान से देखना शुरू किया.
यह नियम-सा बन गया था कि सुबह महाविद्यालय आते और सक्सेना सर के कमरे में जाकर उस चित्र को देखते हुए उसमें अलिखित गाली ढूँढ़ते. गाली ढ़ूँढ़ने में इस चित्र से मेरा एक संबंध बनने लगा. उस चित्र में वे संकेत दिखाई देने लगे जो हुसैन को हुसैन की तरह स्थापित करते थे. हुसैन की चित्र-भाषा स्पष्ट होने लगी. मैं कभी उस चित्र में गाली नहीं ढूँढ़ पाया. वह चित्र मेरी स्मृति में बस गया था.
बरसों बाद हुसैन से इस पर बात हुई. मैंने कहा, ‘‘उस चित्र में ऊपर की ओर आपने कुछ अक्षर लिखे हैं और सक्सेना सर का कहना है कि आपने गाली लिखी है. आप ने क्या लिखा है? ”
उन्होंने कहा, ‘‘उस वक्त मेरी तीन प्रेमिकाएँ थी, उनके नाम के प्रथम अक्षर हैं.’’ उस चित्र में वे महज़ उनकी प्रेमिकाओं के प्रथम अक्षर नहीं बल्कि संकेत थे. स्वामी कहते थे कि चित्र में कोई भी संकेत, संकेत भर नहीं रह जाता वह प्रतीक बन जाता है. वे प्रतीक बन चुके अक्षर थे. इस तरह के वहाँ चार-पाँच संकेत हैं, जो प्रतीक बन जाते हैं. यहाँ से एक संबंध हुसैन के चित्रों के साथ बनना शुरू हुआ, जो गहराता गया. लगातार हुसैन की मौजूदगी से और मेरे पिता जो बतलाते थे उससे. यह दिखाई देना शुरू होने लगा कि हुसैन की इन आकृतियों का गहरा संबंध भारतीय शिल्प से है. गुप्त काल की मूर्तियों और चोला धातु शिल्प से है. भारतीय समकालीन लोक सँस्कृति से और कला की शुरुआत से है. आधुनिकता और भारतीय परम्परा से है.
मेरे साथ उनका संबंध गहराने के दो कारण हैं. वे मेरे पिता के अच्छे मित्र थे. दूसरा जब भी उनसे मिलना हुआ है बातचीत का विषय समकालीन चित्रकला संसार ही रहा है. किन्हीं दीगर चीज़ों में मेरी दिलचस्पी न होने के कारण मैं उनसे हमेशा उन विषयों को लेकर बात करता रहा हूँ, जो मेरी अपनी समझ में चित्रकला के लिए महत्त्वपूर्ण हैं. मैंने कभी उनसे उन विवादों को लेकर बात नहीं की या इस तरह के विषयों को लेकर बात नहीं की जो फौरी हैं व कुछ समय बाद ग़ायब हो जाने वाले हैं. एक तरह की रचनात्मक बातचीत में ही उनके साथ सारा समय सुधरा है. कभी ऐसा नहीं हुआ कि समय काटने के लिए समय गुज़ारा हो.
4.
A painter is surrounded by forms, natural and mechanical,
but his memory on which he relies holds the experience, the distilute of forms,
in essence and in physical relationships.
जब भी उनसे बात होगी वे यह पूछना नहीं भूलते कि काम कैसा चल रहा है, क्या कर रहे हो आजकल, कहाँ प्रदर्शनी चल रही है. उनकी चिन्ता मेरे अपने संसार में मैं क्या कर रहा हूँ, उसको लेकर रहती है. मुझे लेकर उनकी दूसरी चिन्ता भारत भवन की नौकरी रही. वे शुरू से कहते रहे कि ‘‘छोड़ो इसे, यह तुम्हारा काम नहीं.’’ जब भी मिलेंगे, पहले यही पूछेंगे, ‘‘तुम नौकरी कब छोड़ रहे हो?”
जब भी उनसे बात होगी वे यह पूछना नहीं भूलते कि काम कैसा चल रहा है, क्या कर रहे हो आजकल, कहाँ प्रदर्शनी चल रही है. उनकी चिन्ता मेरे अपने संसार में मैं क्या कर रहा हूँ, उसको लेकर रहती है. मुझे लेकर उनकी दूसरी चिन्ता भारत भवन की नौकरी रही. वे शुरू से कहते रहे कि ‘‘छोड़ो इसे, यह तुम्हारा काम नहीं.’’ जब भी मिलेंगे, पहले यही पूछेंगे, ‘‘तुम नौकरी कब छोड़ रहे हो?”
एक बार घर आये. एक रेखाचित्र बनाया-शाहीन का और उस पर इकबाल के शेर की पँक्ति लिखी : ‘तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा’. कहा कि ‘just fly’. मेरे अपने चित्रकला संसार को लेकर उनका सरोकार मेरे लिए महत्त्वपूर्ण रहा है. जब मैंने नौकरी छोड़ी, सबसे ज़्यादा खुशी भी उन्हें हुई. इस तरह की उनकी मेरे प्रति चिन्ता होना भी हमारे सम्बन्धों को गहराता है.
यह उनका बड़प्पन है कि मेरे जैसे अज्ञातकुलशील चित्रकार के बारे में वे चिन्ता करे. इतना ख्याल रखें. अन्य चित्रकार भी हैं, लेकिन किसी और के साथ उनका ऐसा संबंध नहीं होगा. वे बहुत चित्रकारों से मिलते भी हैं पर वे संबंध मुलाक़ात पर ख़त्म हो जाते हैं. उनसे एक नैतिक सहारा मिलता है. उन्होंने हमेशा मेरे आग्रह का सम्मान रखा. इसका एक उदाहरण ‘‘अनादि’’ चित्र-प्रदर्शनी है. यह प्रदर्शनी मैंने रत्नोत्तमा सेनगुप्ता के साथ मिलकर दिल्ली में आयोजित की थी. प्रदर्शनी में मध्यप्रदेश से लगभग पैंतालीस चित्रकार थे. तब सोचा कि क्यों न हुसैन साहब प्रदर्शनी का उद्घाटन करें मैं उनसे मिलने गया और कहा कि ‘‘हम एक चित्र-प्रदर्शनी का आयोजन कर रहे हैं अगर आप उसका उद्घाटन कर सके’ वे बोले, ‘‘हाँ क्यों नहीं. मैं कर दूँगा.’’ मैंने कहा, ‘‘जब आप उद्घाटन कर रहे हैं तब इसका निमन्त्रण-पत्र भी लिख दीजिए.’’
उन्होंने कहा, ‘‘हाँ, क्यों नहीं.’’ आमन्त्रण पत्र का मज़मून मैंने तैयार किया था और उसमें लिखा : Eminent artist M. F. Husain will inaugurate the exhibition. वे आमन्त्रण पत्र का मज़मून लिखने लगे. इस पँक्ति तक आये. कहने लगे कि ‘‘मैं eminent नहीं हूँ, आर्टिस्ट भी नहीं हूं यह कैसे लिख सकता हूँ?”मैंने कहा-यह आप अपनी तरफ़ से नहीं लिख रहे हैं, हमारी नज़र में आप एमिनेंट आर्टिस्ट है और निमन्त्रण हमारी तरफ़ से है, आपकी तरफ़ से नहीं. तो बोले- नहीं, यह कैसे हो सकता है, यह मेरी लिखावट है, यह ग़लत होगा. इसको लेकर वे दस पन्द्रह मिनिट संशय में रहे. किसी तरह उन्हें मनाया कि वे सिर्फ़ लिख रहे हैं, आमन्त्रित नहीं कर रहे हैं. काफ़ी जद्दोज़हद के साथ उन्होंने ‘एमिनेंट आर्टिस्ट’ लिखा, जिससे वे अन्त तक सहमत नहीं थे.
प्रदर्शनी की शुरुआत वाले दिन सुबह मैंने उन्हें फ़ोन किया तो पता चला कि वे मुम्बई में हैं. मैंने उनसे कहा कि आज शाम आपको प्रदर्शनी का उद्घाटन करना है. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे ख़याल ही नहीं रहा, मैं मुम्बई में हूँ.’’ अचानक वे दो बजे आ गये. पाँच बजे तक रहे. कलाकारों से बातचीत करते रहे. चित्रों को टाँगने की सलाह देते रहे. चित्र देखते रहे. सभी खुश थे कि हुसैन साहब साथ हैं. चाय पी रहे हैं. वे सबके काम पर बात कर रहे हैं. अनौपचारिक शुभारम्भ हो चुका था. पाँच बजे वापस मुम्बई चले गये. प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन शाम को आने वाले अतिथियों ने किया. उन्होंने अपना वायदा निभाया. हुसैन के भीतर ऐसी कई बातें हैं, जो अनूठी है; किसी अन्य चित्रकार में नहीं मिलेंगी. अत्यन्त स्नेह और तात्कालिक अलगाव हुसैन का आत्यन्तिक स्वभाव है. पूरी रुचि और पूरी अनासक्ति उनके गुण हैं. सारे चित्रकारों में हुसैन इन्हीं गुणों के कारण एकदम अलग हैं और सम्भवतः इसीलिए वे हुसैन हैं. ‘सम्भवतः’ इसलिए लिख रहा हूँ कि अनेक गुणों से मेरा परिचय अभी होना बाक़ी लगता है.
5.
जब मैं छोटा ही था, एक दिन हमने देखा कि एक व्यक्ति, टोकरे में जलेबियाँ लेकर सुबह-सुबह छः बजे हमारे घर आया हुआ है. उसका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक था. चमकदार उपस्थिति और जादुई क्रियाकलाप. हम सबने जलेबियाँ खाईं. फिर कई साल बाद जब हम उन्हें हुसैन की तरह जानने लगे तब ऐसे ही किसी एक दिन वे फिर सुबह छः-सात बजे जलेबियाँ लेकर आये. यह घटना छुटपन की उस स्मृति से जा टकरायी कि यही व्यक्ति हैं. जब भी वे हमारे घर आये, अक्सर अल्सुबह आये. किसी और वक्त नहीं. हमेशा सुबह छः से सात बजे के आसपास. मुझे याद नहीं कि बग़ैर गर्म जलेबियों के कभी आये हों.
सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में भी उन्होंने हम कुछ मित्रों की एक समूह चित्र-प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था. उस वक्त मेरे एक दोस्त की मिठाई की दुकान की आंतरिक सज्जा का काम चल रहा था. शहर में दो कलादीर्घाएँ थी. वहाँ जाकर दरयाफ़्त किया पता चला कि दोनों दीर्घाओं में किन्हीं अन्य कलाकारों की प्रदर्शनी लगी हुई हैं. उसी दुकान में- जिसमें आंतरिक सज्जा का काम चल रहा था - बैठे, सोचने लगे कि क्या करें. निराशा से भरे हुए थे. तभी वे, जो आंतरिक सज्जा का काम कर रहे थे, बोले कि आप यहीं प्रदर्शनी कर लीजिए. मैं इसे एक दीर्घा में बदल देता हूँ. उन्होंने एक रात में उस दुकान को ख़ूबसूरत वीथिका में बदल दिया. दूसरे दिन हम खुद भी उस जगह को पहचान नहीं पाये. हमने वहाँ चित्र-प्रदर्शनी लगाई. हुसैन ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया. जगह देखकर उन्हें मज़ा आ गया.
इन्दौर में हम लोगों की छोटी-सी मण्डली थी. जब भी कोई चित्रकार इन्दौर आता, हम चित्र-प्रदर्शनी आयोजित करते. उन्हें आमन्त्रित कर लेते. इस तरह हमें उन चित्रकारों के साथ निजी रूप से दो-चार घण्टे बिताने का मौक़ा मिल जाया करता था. इनमें अगर किसी ने हमारा आग्रह ठुकराया तो वे एन. एस. बेन्द्रे थे. वे नहीं आये, न प्रदर्शनी का उद्घाटन ही किया. हमने उनसे कहा कि तीन दिन प्रदर्शनी है, आप इस बीच कभी आइये, वे नहीं आये. इन्हीं बेन्द्रे साहब को हुसैन अपना गुरु मानते हैं. यह भी एक दिलचस्प कोण है. हुसैन कभी नहीं भूलते कि यह बेन्द्रे ही थे, जिन्होंने पहली बार उन्हें एक चित्रकार के रूप में पहचाना और उनके पिता से जाकर बात की. कला महाविद्यालय में दाख़िला दिलवाने के लिए पीछे पड़े. इस ऋण को उन्होंने कभी विस्मृत नहीं किया.
6.
As I begin to paint hold the sky in your hands as the stretch of
my canvas is unknown to me.
हुसैन मेरी कई चित्र-प्रदर्शनियों में आये, एक समूह चित्र प्रदर्शनी को छोड़ कर. नब्बे के दशक में हमने मुम्बई में एक प्रदर्शनी की. मैं, हर्ष स्वामीनाथन, भगवान चौहान और सुधाकर यादव, हम चार लोगों की समूह प्रदर्शनी थी. मैंने हमेशा की तरह उन्हें फ़ोन किया कि बाबा हमारी चित्र-प्रदर्शनी है, आप आइए. वे बोले-‘‘कहाँ है’ मैंने बताया कि जहाँगीर कला दीर्घा में. बोले कि ‘‘यह जहाँगीर कला दीर्घा कहाँ है” मैं समझ गया कि बाबा के साथ जहाँगीर का कुछ बेठीक हुआ है. बाद में पता चला कि जहाँगीर कला दीर्घा की तथाकथित कलाकारों और रसिकों की समिति ने उन्हें बहिष्कृत किया हुआ था.
7.
उनके साथ मेरी बातचीत हिन्दी साहित्य के इर्द-गिर्द होती रही है. खासकर कविताओं पर. उनकी कविताओं में गहरी दिलचस्पी है. उनके बहुत सारे कवि-मित्र भी हैं. उनका भरा पूरा संसार साहित्य से लबालब है. हम दोनों के बीच कविताओं पर अक्सर बातचीत होती रहती है. जब भी फ़ोन पर बात होगी तब अन्यान्य बातों के अलावा इस पर भी ज़रूर बात होगी कि इधर कौन अच्छी कविताएँ लिख रहा है या इधर कौन-सी कुछ नयी कविताएँ/किताबें पढ़ी हैं. यह उनकी आंतरिक रचनात्मक भूख है, जिसे वे अपने दोस्तों की बीच बाँटते हैं. वे अपने स्वभाव से ही कई बातें करते रहे हैं. हुसैन का गद्य एक चित्रकार का गद्य है. बरसों पहले स्वामी की Contra नामक पत्रिका के लिए उन्होंने एक कविता लिखी थी. कविता की भाषा एक चित्रकार की भाषा है. CRACKS IN REMEBRANDT कविता में एक पँक्ति है-‘whose brown burns in me’ यह जो वाक्य है वह एक चित्रकार ही बना सकता है. 1966 में छपी यह कविता इस प्रकार है :
I am aware of मुझे अहसास है
Cracks in Remebrant रेम्ब्रां के चित्रों की तड़कन का
Whose Brown Burns in me जिनके कत्थई मुझमें जलते हैं
Though हालाँकि
Rock-rust boots चट्टानी गेरू-सी धूल से सने जूते
Are ditched-deep गहरे धँसे हैं
Yet फिर भी
The silky sun there वह रेशमी सूरज वहाँ
Shrills me मुझे तीखी आवाज़ देता है
-मक़बूल फ़िदा हुसैन
हुसैन के गद्य में उनका अनुभव झलकता/चमकता है बजाय इसके कि वे एक वैचारिक, सैद्धान्तिक स्थापना करने की कोशिश करें. मेरे ख़याल से वे समझते हैं कि ऐसी कोई बात मौजूद नहीं है, जिसकी स्थापना की जानी चाहिए. बल्कि वे अपने चित्रों के लिए भी यह ख़्वाहिश ज़ाहिर कर चुके हैं कि ‘‘मैं मरने के पहले अपने चित्रों को जला देना चाहता हूँ.’’ यह उनका अपना देखना है, रचनात्मक संसार को, उनकी अपनी नज़र में, उसकी निस्सारता या उसके निरर्थक होने को या इस अनन्त समय की उपस्थिति में अपने होने की क्षणिक चमक के अहसास की तीव्रता. यही रुख उनका अपने गद्य के प्रति भी है. वे उसको भी उसी तरह बरतते हैं : तात्कालिक, अचानक उनको सूझा और उन्होंने लिखा. हाल ही में उन्होंने मुझे लन्दन में अपनी आत्म-कथा का नया अध्याय सुनाया. अध्याय का शीर्षक ‘‘दो रोटी’’ है. दो रोटी को लेकर जितनी मशक्कत उन्होंने अपने जीवन में की होगी, यह अध्याय उसकी व्याख्या नहीं है या उसके बारे में चित्रण नहीं है. यह एक मनुष्य के जीवन में दो रोटी के महत्त्व का-चाहे वह कोई भी हो-उसमें अपना अनुभव है, जो पूरी सच्चाई के साथ उनके गद्य में झलकता है. उसमें भी उनका विनोदी स्वभाव दिखाई देता है/जीवन के बड़े रहस्यों को नहीं, बल्कि वे रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में, तथ्यों में, उनकी सच्चाई को, अनुभव करते हैं, लिखते हैं. उनके इर्द-गिर्द फैली, उनके द्वारा जी गयी ज़िन्दगी के खट्टे-मीठे पल उनके लिखने के अंश हैं.
हुसैन के लेखन व चरित्र में एक खास बात है कि वे अपना मज़ाक़ उड़ाने की क्षमता रखते हैं. अपनी ही बातों का मज़ाक़ उड़ाने की भी क्षमता रखते हैं. वे अपने को बहुत सहजता से लेने-बरतने वाले व्यक्ति हैं. उनसे मिलकर यह नहीं लगता है कि इस सदी के महत्त्वपूर्ण व महान चित्रकार से मिल रहे हैं. उनकी उपस्थिति के साथ आप कुछ ही क्षणों में सहज हो जाते हैं. उनमें ऐसी क्षमता है कि वे अपने इर्द-गिर्द ऐसा माहौल खड़ा कर लेते हैं जिसमें नया, अन्जान व्यक्ति सहज व सामान्य महसूस कर सके. वार्तालाप शुरू हो सके. यही उनके गद्य में भी झलकता है. इसे लेकर वे सजग हैं न लापरवाह. जब वे लिख रहे हैं तब वे जानते है कि उनके लिखे से क्या सम्प्रेषित हो सकता है. वे अच्छा लिखते हैं. रसभरा जैसे कि उनके चित्र हैं. उनका लिखा सूखा-सा गद्य न होकर रसीला, चटकारेदार गद्य हो सकता है. चाहे उनकी अपनी जीवनी हो या नयी चित्र-प्रदर्शनी को लेकर लिखी गयी कुछ पंक्तियाँ हों या किसी विशेष श्रृंखला के लिये उन्होंने कुछ सोचा-समझा हो या चित्रित करने के दौरान उनके विचार हों : उनका लेखन अत्यन्त प्राञ्जल, रोचक, बाँध लेने वाला होता है. यद्यपि उसकी तात्कालिकता साफ़ नज़र आती है. जैसे ‘गजगामिनी’को लेकर उन्होंने एक लम्बी कविता लिखी है. यह कविता उनकी माँ से सम्बन्धित है, बात माधुरी दीक्षित की है. अन्त में जाकर चूँकि उनके मन में माँ की प्रतिमा अधूरी है इसलिए माधुरी है : माँ अधूरी है, इस तरह का संबंध वे ख़ूबसूरत ढँग से निकाल लाते हैं. माधुरी और अपनी माँ के बीच यह संबंध हुसैन के मन में बना. उनकी माँ की मृत्यु के वक्त वे छः महीने के थे और वे जब माधुरी से मिलते हैं, उस वक्त माधुरी की उमर वही थी जिसमें माँ का देहान्त हुआ. अपनी माँ का चेहरा उन्हें याद नहीं. उन्होंने अपनी माँ को कभी चित्रित नहीं किया. माँ की जितनी भी छबियाँ चित्रांकित की हैं, उनमें देखा जा सकता है कि चेहरे नहीं हैं. उनके पास अपनी माँ की कोई छवि नहीं है. उनकी स्मृति में कोई बिम्ब नहीं है, सो बनाते नहीं हैं. अन्य स्त्रियों के चित्रण में नाक-नक़्श वग़ैरह सब होगा. ऐसी उनकी अचेतन वाबस्तगी है.
मदर टेरेसा के चित्रण को लें. वे मदर टेरेसा से मिले हैं, उनके साथ घूमे हैं, कलकत्ता की उन गलियों में गये हैं, जहाँ माँ सेवा करती थीं. मगर उन्होंने कभी मदर टेरेसा का चेहरा नहीं चित्रित किया है. नीले रंग की पट्टियाँ माँ का चित्रण हैं, उससे मदर टेरेसा बन रही हैं. उन्होंने कई व्यक्ति चित्र बनाये हैं. मदर टेरेसा भी सामने थीं और वे उन्हें भी उसी पारम्परिक ढँग से चित्रित कर सकते थे. चूँकि वे यहाँ अपनी माँ को वैश्विक माँ की तरह देखते हैं, चेहरा नहीं बनाते. यह उनकी समझ या अवचेतन ही है. उनके भीतर बहुत गहरे से टँग गया है. उनकी माँ अपनी अनुपस्थिति में उपस्थित है. वह है, किन्तु पहचान नदारद हैं. यह उनकी कविता में भी स्पष्ट होता है.
उनकी भाषा सब चीजों से रची-बसी है, जिसमें कविताएँ भी हैं, अशार भी हैं. उर्दू या फ़ारसी ज़बान के. उन्हें इन भाषाओं का अच्छा ज्ञान है. एक बार उनका एक चित्र टाइम्स ऑफ़ इण्डिया अख़बार ने नये साल के उपलक्ष्य में मुखपृष्ठ पर छापा. उसके कई दिन बाद मैं उनसे मिला. मैंने इस चित्र का ज़िक्र किया, देखना चाहा. उन्होंने कहा कि मालूम है वह चित्र किस काव्य पँक्ति पर था-शमशेर बहादुर सिंह की कविता ‘पतझर’ की काव्य पँक्ति : ‘‘एक पीली शाम/पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता.’’ हुसैन इस ख़म को पहचान पा रहे हैं. ज़रा-सा अटकापन जो है उसका. उनकी चित्रभाषा साहित्य से गहरे संबंध बनाती हुई होती है. सामान्य बातचीत में भी वे फ़ारसी का एक शेर पढ़ उसका तर्जुमा कर बताते हैं.
उनकी भाषा बहुत सुघर, सँवरी और उसी वक्त विनोदमय है. जिसमें वे सब समकालीन सन्दर्भों का इस्तेमाल करते हैं और किसी भी विषय को बरतने से चूकते नहीं हैं. चाहे फिर वह भाषा का कोई शब्द हो जिसे व्यवहार में नहीं लाया जाता है, या सिनेमा, राजनीति, खेल-खिलाड़ी/कोई भी विषय नहीं छूटता है. हुसैन की शाइस्तगी कमाल की है. नफ़ासत गहरी है. वे कभी भी ऐसे स्तर पर नज़र नहीं आते जो थोड़ा भी हल्का हो. उनकी वाक्य संरचनाओं से लेकर उनकी बातचीत के विषयों और अपनी चित्रकला के संबंध में भी कभी ऐसा वाक्य उनसे सुनने में नहीं आता, जो कुछ हल्का इशारा करता हो. हुसैन का होना पूरी एक सदी का होना है. यह होना उनके अनुभवों को गहरा देता है. अपने देखने को, अपने पढ़ने को, अपने समझने को एक अर्थ प्रदान करता है. श्रोता या दर्शक के लिए यह रुचिपूर्ण और प्राञ्जल हो जाता है.
हुसैन की लिखी हुई ये कविताएँ इसका एक प्रमाण हैं :
1.
मुझे आसमान की बर्फ़ ढँकी चादर भेजो
जिस पर कोई दाग़ न हो
तुम्हारी अनन्त उदासी के घेरे को
मैं सफ़ेद फूलों से
कैसे चित्रित करूँ
जब मैं चित्र बनाने लगूँ
तो आसमान को अपने हाथों में पकड़ लेना
क्योंकि मैं अपने कैनवास के
फैलाव से अनजान हूँ.
2.
मेरे पत्र
जलती हुई आवाज़ों के निशान
पूरे महीने की बर्फ़ानी ठण्ड
तुम्हारे नक़्क़ाशीदार दरवाज़े के अन्दर
शायद आग बुझा दे.
अपने दरवाज़े को ताला लगा लो
चाभियाँ एक तरफ़ फेंक दो
मेरा पत्र अनपढ़ा रहने दो.
3.
जब जवान पत्ते
चिमनियों के धुएँ में
पिघलते हैं
और आसमान का गीला काग़ज़
बत्तियों वाले खम्भों पर
झुक जाता है,
झलकते हुए दूध की भरी हुई गाड़ी
रास्ते को रौशन करती है
और एक लड़का
मन्दिर की सीढ़ियों पर
नंगे पाँव चलता हुआ
ख़ाली शहर को
खाना शुरू करता है.
वहाँ अस्तित्व की
गूँजती हुई आवाज़
हँसी में फूट पड़ती है.
नीली रात
उसकी चादर पर से फिसलती है
उसकी जाँघ पर
एक निशान डाल जाती है.
वे दूर
जिस्मों के पीले-भूरे रंग
कश्तियों के पीछे लरज़ते हैं.
अचानक एक सफ़ेद रंग
क्षितिज को काटता है
उससे नीचे का दृश्य
अवाक् रह जाता है.
सलेटी रंग की रेत
उसकी चादर से
ढँकी रहती है.
(1974, अनुवाद : सुखबीर)
8.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि महात्मा गाँधी के बाद मक़बूल फ़िदा हुसैन दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दुस्तान को गहरे से जाना है. गाँधी ने भारत की जनशक्ति को पहचाना, हुसैन ने भारत की साँस्कृतिक शक्ति को. भारतीय सँस्कृति के वैविध्य को आत्मसात् कर अपने चित्रों में जुबान दी. हुसैन के चित्रों की भारतीयता एक भारतीय की है. उन्होंने उसे लाने की या पाने की चेष्टा नहीं की. भारतीयता हुसैन के चित्रों पर आरोपित नहीं है, वे इन चित्रों की आंतरिक चेतना है. इनकी बुनावट लोक-चेतना मिथकीय साँस्कृतिक वैविध्य के ताने-बाने से की गयी है. वे भारतीयता की खोज नहीं करते, वे भारतीयता रचते हैं.
हुसैन के अलावा हिन्दुस्तान के साथ इतनी गहराई से और कोई चित्रकार अपने संबंध नहीं बना सका है. ज़्यादातर चित्रकार ऊहापोह में अपना रचनात्मक जीवन व्यतीत करते नज़र आते हैं. अगर कोई दूसरा चित्रकार इस सबसे उलझता-जूझता दिखायी देता है तो वह स्वामीनाथन हैं. वे एक दूसरे स्तर पर- जो कि इन साँस्कृतिक स्तरों की व्यञ्जना का स्तर है-जाकर अपनी परम्पराओं से संबंध बनाते नज़र आते हैं. एक मनुष्य की परम्परा से. यह गहरा संबंध दोनों चित्रकारों में नज़र आता है. दोनों अपने ढँग से हिन्दुस्तान की सार्वभौम सँस्कृति को अपने चित्रों में साँस लेते हुए रचते हैं. यह सँस्कृति किसी एक समुदाय की नहीं है, न किसी एक विशेष परिस्थिति में रहने वाले लोगों की, यह मानव-जाति की सँस्कृति है, इसका एहसास इन दोनों चित्रकारों ने अपने चित्रों में किया है. वे चित्र की सम्भावना के असम्भव को रचते हैं.
महात्मा गाँधी अफ्रीका से हिन्दुस्तान लौटते हैं, उस वक्त तक वे अफ्रीका की सक्रिय राजनीति के कारण विख्यात हो चुके हैं. वे ‘हिन्द स्वराज’ लिख चुके हैं. हिन्दुस्तान आने पर वे गोपालकृष्ण गोखले से मिलते हैं, जिन्हें वे अपना गुरु भी मानते हैं. गोखले उनसे कहते हैं- आप भारत आये हैं, किन्तु यहाँ के बारे में आपको कुछ नहीं पता है. आप वायदा कीजिए कि एक साल हिन्दुस्तान की राजनीति के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहेंगे और इस एक साल में आप इस देश में घूमिए, उन लोगों को जानिए जिनकी राजनीति आप करने वाले हैं. गाँधी ने इसका पालन किया और पूरे एक साल घूमे. वे घूमते हैं और हिन्दुस्तान की लोक शक्ति का अहसास करते हैं.
हम देखें कि 1947 में जब देश आज़ाद होता है तब हुसैन के साथी युवा चित्रकार देश छोड़ विश्व के अलग अलग हिस्सों, लंदन, पेरिस, न्यूयार्क चले गये: कि कला यहाँ है और इसको देखना-सीखना चाहिए. अब हम एक आज़ाद देश है, हमें इसे समझने की ज़रूरत है. आज़ाद मुल्क की समकालीन कला की रूपरेखा क्या हो, यह सबकी चिन्ता, चिन्तन का विषय रहा. इन सब लोगों की इच्छाएँ भी उतनी ही शुद्ध थी जितनी हुसैन की. इसके विपरीत हुसैन गाँवों में चले जाते हैं. रामलीला के पीछे घूमते हुए उसको देखते-समझते-उन लोगों से मिलते हुए, लोक सँस्कृति के विभिन्न रूपों को जानते हुए, उनका चित्रण करते हुए, उसी का एक अंग बनते हुए, उसी में अपने को खपाते-खटते हुए, वे हिन्दुस्तान की भीतरी यात्राएँ करते हुए हिन्दुस्तान के वैविध्य को आत्मसात् करते हैं. यह सब उन्होंने उस दौरान किया, जिस दौरान समकालीन या उनके बाद के चित्रकार जो ब्रितानवी कला हिन्दुस्तान में मौजूद थी, उसकी जगह फ्रांसिसी या मेक्सिकन कला लाने की कोशिश कर रहे थे. बजाय इसके कि वे अपनी जड़ों में, अपनी परम्परा में, अपनी सँस्कृति में कुछ ढूंढ़ते-खँगालते और पाते.
जो काम हुसैन अकेले बेफ़िक्र अन्दाज़ में 1948 से कर रहे थे, उसकी जोरदार घोषणा ग्रुप 1890 बहुत बाद 1963 में जाकर करता है. वह कहता है कि ‘रचनात्मक अभिव्यक्ति’ तलाश नहीं, बल्कि वैयक्तिकता का मुक्त होना और प्रकट होना है.’ वह अपने वैयक्तिक ‘देखने’ को महत्त्व देता है. हिन्दुस्तानी कला में पहली बार भारतीयता को आत्मग्लानि की जगह आत्मसम्मान की तरह देखा गया. अक्तावियो पाज़ ने भी इन युवा चित्रकारों से प्रभावित हो, उनकी प्रदर्शनी का कैटलॉग लिखा.
हिन्दुस्तानी चित्रकला के संसार में हुसैन अकेले कलाकार नज़र आते हैं, जिन्होंने खुद को, अपनी सँस्कृति के बीचोंबीच, बहुत गहरे महसूस किया है. इसका प्रतिफलन उनके चित्रों के रूप में हमारे सामने हैं. समकालीन चमकते हुए कला-संसार में हम उसका प्रभाव देखते हैं जिसे विश्वास के दम पर हुसैन बनाते हैं. इसमें कोई भी उनकी मदद करने आगे नहीं आता है. यदि किसी ढँग से कोई हुसैन के साथ खड़ा होता नज़र आता है तो वे स्वामीनाथन हैं. बौद्धिक, वैचारिक रूप से प्रखर, वे भी वही बात करते हैं, हुसैन के कई साल बाद.
हुसैन 1955-56 में शुरू करते हैं, जिसका विचार 1948 से चल रहा होता है, जब वे राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शनी देखकर लौटते हैं. इस प्रदर्शनी में भारतीय शिल्प की अद्वितीय भावोत्पादक अभिव्यक्ति गुप्तकालीन शिल्प और चोल काल के काँस्य शिल्प में देखते हैं. हुसैन की लोक चेतना में शास्त्रीय शिल्प विधान की दृढ़ता का हस्तक्षेप होता है. वे लोक सँस्कृति के सहज और आडम्बर रहित तत्त्वों में कल्पना से भरे हुए इन शास्त्र सम्मत शिल्पों का सम्मिश्रण कर भारतीय समकालीनता की शुरुआत करते हैं. बाद में स्वामीनाथन भी इसी रास्ते की ताईद करते हैं, जिसमें मनुष्य की अभिव्यक्ति को प्रमुखता से रेखांकित करते हैं. स्वामीनाथन और हुसैन के बीच यह साझा बहुत बाद में जाकर स्थापित होता है.
ध्यान देने वाली बात है कि हुसैन इससे पहले ही समकालीन चित्र संसार का एक स्वरूप खड़ा कर चुके हैं जिसे स्वामीनाथन बौद्धिकता का आधार प्रदान करते हैं. स्वामीनाथन उस मनुष्य की रचनात्मकता पर जोर देते हैं, जो अपने समय की विभीषिका झेलते हुए सामने रखे कैनवास को उगते हुए सूरज की तरह देखता है. इस मनुष्य की ताक़त ही उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति है, जिसमें उसकी वैयक्तिता प्रकट हो रही है न कि सामाजिक यथार्थ.
स्वामीनाथन का रचयिता ‘‘राजा रवि वर्मा के अश्लील यथार्थवाद और बंगाल स्कूल के आदर्शवादी ग्राम्यजीवन सम्बन्धी चित्रों के’’ ख़िलाफ़ खड़ा होता है. वहीं दूसरी तरफ़ हुसैन अपने हाथों में आकाश थामे होने की बात करते हैं. वहाँ उनका रचियता भी इस अनन्तता की ही तरफ़ इशारा करता है, जहाँ सूर्योदय हो रहा है. जिसे हुसैन अपने चित्रों से रच रहे हैं. हुसैन की अकेली शख़्सियत इस समकालीन कला संसार को बनाती है, जिसका लाभ अब हमारी पीढ़ी ही नहीं बल्कि युवतर पीढ़ी तक पहुँचता है. आज भी कला महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले युवा मन में पहली छबि हुसैन की ही होती है. वह अपना आत्मबल वहीं से प्राप्त कर इस दिशा में क़्दम बढ़ाने की कोशिश करता है. यह आलोक हुसैन अकेले दम पर फैलाते हैं, जिसमें कई साल बाद आने वाला युवा चित्रकार भी प्रकाशित होता है.
अपनी सँस्कृति के साथ हुसैन का संबंध और अपने अनुभव के साथ उनका रचना-काल महत्त्वपूर्ण है. वे एक स्वतन्त्र देश की ऐसी स्वतन्त्र चित्रभाषा रच पाते हैं, जिसके विषय बहुवचनात्मक हैं-धार्मिक मान्यताओं से लेकर राजनीतिक उठा-पटक तक. रोज़मर्रा की दिनचर्या से लेकर महत्त्वपूर्ण घटनाओं तक यह उदाहरण पाना मुश्किल लगता है कि हुसैन ने हिन्दुस्तान के लिए जो काम किया है, वैसा काम किसी और चित्रकार ने अपने देश के लिए किया हो. यह हुसैन का महत्त्वपूर्ण अवदान है: कि भारतीय कला की समकालीनता रचते हुए हिन्दुस्तान की साँस्कृतिक पहचान का परचम विश्व भर में फहराने का. कई देशों के राष्ट्रीय संग्रहालयों में किसी और भारतीय चित्रकार के चित्र हो या न हों, हुसैन के चित्र ज़रूर होते हैं. बड़ी संख्या में मिलते हैं. हुसैन यहाँ भी अपनी उपस्थिति दर्ज़ कर चुके हैं. यह उनकी अपनी क्रियाशील ज़िंदगी है जिसमें वे लगातार सक्रिय रह कर न केवल रच रहे हैं बल्कि उस रचने को पूरी दुनिया में प्रदर्शित भी कर रहे हैं.
9.
मेरे ख़याल से हुसैन का खुद को चित्रों में बरतने का ढँग देश की विभिन्न सँस्कृतियों से आये अनुभवों का सार है. आन्ध्र प्रदेश का साँस्कृतिक वैशिष्ट्य बंगाल से भिन्न है. राजस्थानी लोक-चेतना मध्यप्रदेश की आदिवासी चेतना से भिन्न है. भारतीय सँस्कृति का यह वैविध्य व बहुलता, कहना चाहिए बहुवचनात्मकता हुसैन के चित्रों में नज़र आती है. भले वे श्वेताम्बरी कर रहे हो या कोलाज या एक चित्र बना रहे हो : सभी में एक भारतीय हुसैन साफ़ नज़र आता है. जैसे कि एक बंगाली, तेलुगु, मलयाली या गुजराती भारतीय है. एक दूसरे से अलग वे अपनी विशिष्टता में रचे-बसे भारतीय हैं. यही एकरूपता हुसैन के चित्रों में संचारित है. उनके चित्रों का अभिन्न छोर/core है. जिसमें एक ओर बिलकुल ही सपाट चटकीले रंगों के कोलाज हैं, जबकि वे जाने जाते हैं मटमैले रंग प्रयोग के कारण या वे एक ऐसी चित्र-प्रदर्शनी दिखलाते हैं जहाँ मानव शरीर चित्रित कर रहे होते हैं या फिर वे सारे चित्र हैं जिन्हें हुसैन के चित्रों की तरह पहचाना जाता हैं. उसी में वे फ़िल्म भी बनाते हैं जो हुसैन का ‘देखना’ है. चाहे वह मीनाक्षी, गजगामिनी हो या through the eyes of a painter. इन सबमें हुसैन का देखना एक भारतीय का देखना है. एक ऐसे व्यक्ति का देखना है जो अपनी सँस्कृति की विविधता को धारण किये हुए है. यहाँ वैविध्य भटकाव नहीं, ताक़त है. यह बहुवचनात्मक साँस्कृतिक चेतना से उपजी हुई एकता है और उसी में समर्पित हुसैन की विशिष्टता है. उनके समकालीन चित्रकार किसी अंग-विशेष को लेकर जीवन भर चित्रण करते रहे हैं, किन्तु हुसैन के साथ ऐसा सम्भव नहीं हुआ. उन्होंने हर बार अपने को दाँव पर लगाया है, जिसमें डूबने और बह जाने का पूरा ख़तरा रहता है. वे एक कलाकार व रचनात्मक व्यक्ति का जोख़िम उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. अपने को दाँव पर लगाने की यह ताक़त ख़ास हुसैन की शैली है.
एक क्रियाशील चित्रकार के रूप में उनके पहले के चित्रों में शुरुआती लड़खड़ाहट भी दिखायी देती है. वे इससे घबराते नहीं हैं, बल्कि रचनात्मक प्रक्रिया के दौरान होने वाले निष्फल चित्रों को भी दिखाने में संकोच नहीं करते. वे अपने अलगाव को भी रुचि से रखते हैं अपने रचनात्मक सन्तोष की तरह.
1955-56 में जब वे एक स्पष्ट भाषा प्राप्त कर लेते हैं तब वे सारे बिम्ब नज़र आने लगते हैं जिनमें उन्होंने भारतीय समाज को रचा-गढ़ा है. एक अर्थ प्रदान किया. 1947 में आज़ादी के वक्त हिन्दुस्तान की अपनी कोई चित्रभाषा मौजूद नहीं थी. साँस्कृतिक रूप से लगभग नष्ट हो चुका रचनात्मक मानस भ्रमित था. अपनी कला परम्परा, अपने विश्वासों को खो चुका था. इस टूटे, बिखरे, भ्रमित, साँस्कृतिक मन को दृढ़, निर्भीक और निडर सहारा चाहिये था. यही टूटन, बिखराव सामाजिक जीवन में रहा था, जिसे महात्मा की वाणी से सम्बल मिला था.
10.
राजा रवि वर्मा ने अँग्रेज़ों के सहयोग से कैलण्डर कला को घर-घर लटका दिया था. अँग्रेज़ बताते रहे कि यही भारतीय चित्रकला है और हम अपनी चित्रकला की पहचान उसी में खोजने पाने लगे थे. आज भी बड़े पैमाने पर लोग उस कैलण्डर कला को ही भारतीय कला का प्रमाण समझते हैं. यह इस सँस्कृति को देखने वाली ‘अँग्रेज़’ दृष्टि है. परायी दृष्टि है. राजा रवि वर्मा प्रतिभाशाली चित्रकार नहीं थे. वे एक साधारण चित्रकार थे, जो तैलरंगों में चित्र बनाने की शुरुआत करते हैं. छापाख़ाना डाल कर अपने कैलेण्डरी चित्रों को कैलण्डर के रूप में घर-घर पहुँचा देने के कारण वे महान चित्रकार हो जाते हैं, ऐसा मानना अज्ञानता ही नहीं गुलामी भी है. राजा रवि वर्मा के चित्र एक कमज़ोर चित्रकार के चित्र हैं. उनकी कल्पनाशीलता भी उनका साथ नहीं देती है. उनके चित्र ही यह कमियाँ बयाँ करते हैं. उनको अँग्रेज़ों का प्रश्रय प्राप्त था, वे एक राजसी खानदान से थे, आर्थिक रूप से सक्षम, एक छापाख़ाना डाल सकते थे. अपने चित्रों की अनेक अनुकृति आसानी से उपलब्ध करा उन्होंने यह किया. हुसैन के आरम्भिक चित्र भी इस परम्परा में नहीं है. वे भिन्न हैं. दरअसल, वे एक मनुष्य की तरह खुद महसूस करने के चित्र हैं. वे उसी मनुष्य के चित्र हैं, जिसने हाथों में आकाश उठा रखा है, जो रचने की शुरुआत ही अनन्तता से करता है.
मुझे याद है इन्दौर में एक कला-सामग्री की दुकान थी. दुकान में हुसैन का 1933 के आसपास का बनाया हुआ एक छोटा सा भू-दृश्य/Landscape टँगा रहता था. यह वह वक्त है, जब हुसैन इन्दौर छोड़ रहे थे. हुसैन का यह चित्र, मालवा का छोटा सा भू-दृश्य/Landscape था. चित्र में धूसर रंग के काग़ज़ पर तीन स्याह धब्बे चित्रित थे. एक विहंगम मालवी भू-दृश्य का चित्रण. वह अमूर्त था. उसमें सिर्फ़ तीन धब्बे रखे थे. धीरे धीरे फैल रहे धब्बों के केन्द्र का गहरा रंग, किनारे आते आते हल्का होता जाता. वे धब्बे तीन वृक्ष की तरह भी थे. जो भी उसे देखता मालवा का एक शुद्ध लैण्डस्केप उसकी कल्पना में खड़ा हो जाता. यह चित्र 1933 में बनाया गया था जब राजा रवि वर्मा ख़ासे लोकप्रिय चित्रकार थे. उनकी नक़ल करने वाले भी कई थे. हुसैन नक़ल नहीं करते, वे सिर्फ़ तीन धब्बे रखते हैं. यह अपने में जोख़िम का काम था.
कल्पना कीजिये, 1933 में एक युवा चित्रकार अपने चारों और बिखरे यथार्थवादी चित्रण के मलबे के बरक्स तीन धब्बे, धूसर काग़ज़ पर रख कला के उस अन्जाने संसार में क़्दम रखता है, जिसे बाद में उसी के नक़्शे क़्दम पर चलना है. यह हुसैन की रचनात्मक भूख थी. यह भू-दृश्य भूख से उपजा चित्र था. सालों तक मैं यह चित्र देखता रहा. अस्सी के दशक में हुसैन ने यह चित्र देखा और दुकान मालिक से कहा कि आप यह चित्र मुझे दे दें बदले में मैं आपको दूसरा चित्र देता हूँ. उन्होंने एक बड़े कैनवास पर घोड़े का चित्र बना कर उन्हें दिया. बदले में यह छोटा-सा चित्र ले कर चले आये. यह उनसे गुम गया और दुर्भाग्य है कि वे जो चित्र दुकानदार को भेंट कर आये थे, वह दुकान से चोरी हो गया.
तात्पर्य यह कि जब रवि वर्मा का भारतीय चित्रकला संसार में प्रभुत्व था तब एक नौजवान चित्रकार उन रास्तों पर नहीं चल रहा था जो पहले से मौजूद है बल्कि वह अपनी भाषा रचने की कोशिश कर रहा था. उस दौर में बेन्द्रे अपना काम कर रहे थे. बेन्द्रे का गहरा असर हुसैन पर रहा. वे बेन्द्रे को अपना गुरु भी मानते है. लेकिन हुसैन बेन्द्रे का भी अनुसरण नहीं कर रहे थे. वे अपनी तरह से देखने, खोजने के उपक्रम में, पूरे जुनून के साथ, मुब्तिला थे. यह महत्त्वपूर्ण है कि हुसैन ने इन सब बातों को जानते समझते उसको न स्वीकारते हुए अपनी भाषा गढ़ी. उसे खोजा, पाया और भारतीय समकालीन कला को उस आज़ादी, समता और सहभागिता की जगह पहुँचाया, जिसे ढूँढ़ने, पाने उनके समकालीन भी भटक रहे थे.
हुसैन अक्सर बेन्द्रे को गुरु की तरह का रुतबा देते हैं, साथ ही सूज़ा के प्रति भी कृतज्ञ होते हैं. इन दोनों का हुसैन पर गहरा प्रभाव है. यह प्रभाव बातचीत तक ही झलकता है. इन चित्रकारों का कोई अंश हुसैन के चित्रों में नहीं आया है. बेन्द्रे की लयात्मकता और सूज़ा का रूखापन उनके चित्रों से बहुत दूर है. अगर मुझे हुसैन के चित्रों में किसी भारतीय चित्रकार की उपस्थिति मौजूद होती दिखाई देती है तो वे दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर हैं, हुसैन के गुरु और इन्दौर स्कूल के संस्थापक. जिन्होंने देवलालीकर के रेखांकन देखे हैं, वे जानते हैं कि उनकी रेखाओं की विशेषता क्या है. वे जानते हैं देवलालीकर अपने रचने में रेखांकन को कितना महत्त्व देते रहे हैं. हुसैन ने उनके रेखांकन अपने विद्यार्थी जीवन में देखे होंगे और इस युवा मन पर उसकी गहरी छाप लगी होगी. बाद में जब हुसैन ‘हुसैन’ की तरह जाने जाने लगे, तब उनकी पहचान में सशक्त रेखांकन एक गुण की तरह देखा गया. हुसैन देवलालीकर की तरह का रेखांकन नहीं करते, वे उनकी रेखाओं में से वक्रता, लय, कोमलता और मधुरता हटाकर उन्हें दृढ़, मजबूत, कठोर और सीधा कर देते हैं. देवलालीकर और हुसैन की कोई समानता नहीं है. देवलालीकर का प्रभाव भी नहीं दीखता. हुसैन अपनी रेखा ढूँढ़ते हैं. 1956 में जाकर पाते हैं.
11.
बाद की मुलाक़ातों में जिन दिनों वे अपनी आत्म-कथा लिख रहे थे. पढ़ कर सुनाते थे-कभी एक अध्याय, कभी कोई दूसरा. एक दिन उन्होंने बताया कि अब बहुत सारे अध्याय इकठ्ठे हो गये हैं और यह पुस्तक रूप में छप रहे हैं. मैंने कहा, ‘‘फिर आप इसे हिन्दी में भी छपवाइये.’’ वे आत्मकथा उर्दू में लिख रहे थे और यह पठन-पाठन अक्सर अचानक हुई मुलाक़ातों में जारी रहता था. मैं यह बोल कर चला आया.
साल भर बाद उनका फ़ोन आया कि तुम आ जाओ, किताब का हिन्दी में अनुवाद हो गया है, उसे सम्पादित कर डालो, मुझे उसमें कुछ गड़बड़ नज़र आ रही है. मैं चला गया. उनकी मित्र कामना प्रसाद ने अनुवाद किया था. हुसैन ने अनुदित पाण्डुलिपि मुझे दी. मैंने देखा कि सम्पादन की ज़रूरत है-कहीं वाक्य संरचनाएँ ठीक नहीं थी, कहीं कुछ और दिक़्क़्त. कुछ-कुछ जगह लगा कि यहाँ से पंक्तियाँ ग़ायब हैं.
मैंने सम्पादित करना शुरू किया. सम्पादन चलता रहा. मैं दो-तीन दिन रहता, फिर लौट आता. फिर अगली बार चला जाता. लगभग एक साल होने को आया. एक बार पता चला वह पाण्डुलिपि जिस पर मैं काम कर रहा था, गुम गयी है. हुसैन बोले, ‘‘पता नहीं कहाँ गुम हो गयी है, मिल ही नहीं रही.’’ उन्हें पता था मैं आ रहा हूँ और उन्होंने ढूँढ़ना शुरू की होगी. अब वह मिल नहीं रही थी. बोले, ‘‘चलो, हैदराबाद चलते हैं, वहाँ होगी.’’ हैदराबाद जा कर ढूँढ़ी. वहाँ नहीं मिली. उन्हें लगा अहमदाबाद हो सकती है. कभी वहाँ जाकर ढूँढ़ी होगी. एक बार उनका फ़ोन आया कि दिल्ली में हो सकती है. लेकिन वह मिली नहीं.
मुम्बई की किसी एक मुलाक़ात में वे बोले, ‘‘तुम्हीं क्यों नहीं लिखते. इतनी सारी बातचीत होती रही है. तुम उस पाण्डुलिपि को भूल जाओ-अब वह गुम गयी तो गुम गयी.’’ हुसैन के हुसैन होने का एक कारण यह भी है कि वे पीछे पलट कर नहीं देखते. मैंने उनसे कहा कि मुझे आपसे बात करनी पड़ेगी, रिकॉर्ड करना होगा. उन्होंने दादीबा पण्डोल को फ़ोन किया कि एक टेप रिकॉर्डर ख़रीदना है. दादीबा एक जेबी रिकॉर्डर ख़रीद कर लाये. मुझे जब भोपाल से छुट्टी मिलती मैं वहाँ चला जाता. हम दो या तीन दिन साथ होते थे. फिर अगली बैठक होती. इस तरह सिलसिला चलता रहा. वे इस रिकॉर्डिंग प्रक्रिया से तँग आ गये. बोले, ‘‘आप छोडें इसे. जो भी बातचीत हो वह याद रखिए. जो याद रहे वह लिखिए और बाक़ी छोड़ दीजिए. मुझे माइक पकड़ कर बोलना अच्छा नहीं लगता.’’ एक दिन हम लोग बातचीत कर रहे थे तब उनका बेटा ओवेस वह पाण्डुलिपि लेकर हमारे सामने से गुज़रा. यह वही पाण्डुलिपि थी जिसे मैं हिन्दी में सम्पादित कर रहा था. हुसैन उछल पड़े. बोले, ‘‘अरे! यह तो हम कब से ढ़ूंढ़ रहे थे. तुम कहाँ ले गये?”
ओवेस शायद फ़िल्म बना रहे थे. उस के लिए रख ली थी. हुसैन ने उसी वक्त तीन चार फ़ोटो-कॉपी करवायीं. एक कॉपी ओवेस को दी. मैंने पाण्डुलिपि में आगे के काम पूरे किये, राशीदा जी ने हाथ से लिखी ‘हुसैन की जीवनी’. इस बीच उनके जीवन पर हमारी बातचीत उनके निक़ाह तक पहुँच गयी थी. मैंने उसे वहीं समाप्त किया. उनके बचपन से लेकर शादी तक.
रिकॉर्डिंग वाला हिस्सा मैंने कभी सुना नहीं. वे सारे कैसेट्स/Cassetes रखे हुए हैं. मैंने स्मृति के आधार पर ही लिखा. कई बार ऐसा लगा कि प्रतिलेखन करवा लूँ. लेकिन जब लिप्यन्तरण के लिए भरत आये तब कैसेट न मिले, जब कैसेट मिले तब भरत न मिले. अभी तक वे कैसेट्स ऐसे ही रखी हैं.
12.
‘मक़बूल’ का स्वरूप लिखने के दौरान तो नहीं लेकिन लिखने के बाद तय होना शुरू हुआ. उसमें कालक्रम देखा जा सकता है. हुसैन के बचपन से शुरू होकर उनके निक़ाह तक. बचपन से शुरू हो कर निक़ाह तक पहुँचने का कारण सिर्फ़ यह है कि इतनी बातचीत के बाद हुसैन से मुलाक़ात होना बन्द हो गयी. वे हिन्दुस्तान छोड़ बाहर चले गये. इस व्यवधान के चलते पाठ यहीं तक रहा. उन्हीं दिनों उनसे बातचीत के दौरान ही यह तय हुआ कि पुस्तक को निक़ाह तक ही रहने दिया जाय. पुस्तक के लिए पहले तय यही हुआ था, उनसे बातचीत के बाद यह लिखी जाएगी. यह सिलसिला सन् 1990 से लेकर 2001 तक चला. बीच-बीच में अन्तराल रहे. कुछ मुलाक़ातें पहले से तय हो जाती थीं, लेकिन ज़्यादातर मिलना आकस्मिक होता था, जिसे थोड़ा आगे बढ़ा लिया जाता था.
एक दिन के लिए मैं मुम्बई गया और हुसैन मिल गये तो दो दिन और रुक जाता. इन मुलाक़ातों में कुछ घण्टे ऐसे मिल जाते, जिसमें हम बातचीत रिकॉर्ड किया करते थे. बाक़ी समय हुसैन की अपनी व्यस्तताएँ इतनी ज़्यादा हैं कि वे उसमें आपको भी शामिल कर सकते हैं. आप उसमें शामिल होते हैं तो हो सकता है कि आपका अगला एक महीना उसमें चला जाये. वे एक ऐसे रचनात्मक केन्द्र हैं, जिसके नज़दीक जाने से आप उसके अन्दर बिला जा सकते हैं. उनका प्रभामण्डल आकर्षक व सशक्त है. हुसैन की सक्रियता अकल्पनीय है. आप उनके साथ रह कर महसूस न करें तब तक समझा नहीं जा सकता है. सक्रिय होने का अर्थ यह भी है कि वे लगातार चित्र बना रहे हैं या एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं या हो सकता है कि वे आपके साथ बैठ कर घण्टों बात ही कर रहे हों, किसी एक रेस्तराँ या अपनी पसन्द की चाय की दुकान पर या शहर के किसी एक कोने में हैं. आप उस में शामिल हो जाते हैं या उसका एक अंग बन जाते है, जो वे कर रहे हैं.
इसी दौरान पुस्तक की कल्पना बनती-बिगड़ती भी रही. जब मैंने सारे अध्याय स्वतन्त्र रूप से लिख लिये और उन्हें सुनाये तब पुस्तक का क्रम हम लोगों ने तय किया. ‘मक़बूल’ के अध्याय उन्होंने अध्याय की तरह नहीं सुनाये. बहुत सी बातें मैंने छोड़ दी हैं. जैसे अपने बचपन में वे बक्से चित्रित करते थे. उस ज़माने में उनके समुदाय में बक्से चित्रित करने के लिए पैसा मिला करता था. दो-तीन पैसे मिल जाते थे. इसका एक लम्बा विवरण उन्होंने मुझे दिया लेकिन यह प्रकरण मुझे किताब में जाता हुआ नहीं लग रहा था, मैंने छोड़ दिया.
मेरा ख़याल है कि वे जो भी बोल रहे थे, उनकी कल्पना मेरी स्मृति का आधार बनी बजाय उनके शब्द. उनके शब्द से जो चित्र उपजे और उन चित्रों से जो शब्द निकले हैं, वे इस पुस्तक को गल्पात्मक बनाते हैं और वे ही उसको अलगाते होंगे. ‘मक़बूल’ की भाषा चित्र भाषा के रूप में ही मुझे नज़र आयी, स्वयं भाषा के रूप में नहीं. चित्र संकेत बन रहे हैं या चित्रों का रूपांकरण संकेत में हो रहा है. मक़बूल का जीवन-रूप देखने की कोशिश में मैंने सिर्फ़ कल्पना का सहारा लिया है. हुसैन ने जीवन के जो प्रसंग बतलाये, वे बहुत बिखरे हुए थे : किसी एक प्रसंग का कोई टुकड़ा उन्होंने दो साल बाद कहा. उन टुकड़ों को जोड़ कर देखना चित्रभाषा का ही काम था. पहेली/puzzle के टुकड़ों की तरह इन्हें जोड़ा और वह पूरी हुई. भाषा की गल्पात्मकता इसी कारण बन रही है जो हुसैन से बातचीत के दरमियान मेरे मन में उभरती चली गयी.
मैं उनके बचपन के इन्दौर के काफ़ी क़रीब जा सका क्योंकि मैं इन्दौर की उन्हीं गलियों में घूमा हूँ जहाँ पर हुसैन बड़े हुए हैं, जिन विद्यालयों में वे पढ़े हैं. हुसैन का घर हमारे घर के बहुत ही नज़दीक था. वह सारा स्थान-विशेष जब हुसैन सुना रहे थे तब मेरे सामने सजीव भी होता जा रहा था कि संयोगितागंज मतलब यहाँ गये होंगे. यह ज़रूर होगा कि अब कुछ वृक्ष नहीं रहे होंगे और कुछ ऐसे सार्वजनिक उपक्रम सामने आ गये होंगे, जो उनके समय में नहीं थे. जब मैं अपने बचपन की ओर देखता हूँ तब वहाँ बहुत ज़्यादा अवकाश नज़र आता है. कल्पनाओं से भरा अवकाश. इतना सीमेंट-कांक्रीट के जंगल से भरा हुआ नहीं है जैसा अब हो गया है.
एक दिन हुसैन ने पूछा, ‘‘वह तुम्हारा मकान कहाँ पर है” मकान हम लोग बेच चुके थे. जिसने ख़रीदा था, उसने मकान तोड़ कर ख़त्म कर दिया था. हमारा मकान ऐसा मकान था, जिसके एक तरफ़ धर्मशाला थी, दूसरी तरफ़ पाठशाला, मकान के चारों तरफ़ सड़क थी. वह एक द्वीप की तरह था. हुसैन के लिए landmark था अपने घर तक पहुँचने का. इस बीच हुसैन कभी वहाँ गये होंगे. चूँकि घर वहाँ नहीं था, इसलिए वे कुछ पहचान नहीं सके.
उन्होंने उस दिन मुझसे कहा, ‘‘मैं अपना घर ढूँढ़ नहीं पाया क्योंकि तुम्हारा घर नहीं दीखा.’’ मैंने बताया कि हमने मकान बेच दिया है. उन्होंने कहा, ‘‘वहाँ इतनी सारी दुकानें थीं कि मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह आ गया हूँ.’’ जबकि वे ठीक जगह पहुँचे थे, किन्तु दृश्य बदल चुका था. ज़ाहिर है वे असमंजस में डूबे वापस चले आये. मेरे बचपन की स्मृतियाँ उन सारी जगहों की हैं जो ख़ाली हैं, जो मेरे घर और हुसैन के घर के आसपास फैली थीं. हुसैन का वर्णन मेरे स्मृति दृश्य के बहुत नज़दीक था. पुस्तक की गल्पात्मक रीति उसी से उपजी है. अब शायद सम्भव नहीं है कि कोई बच्चा उस परिवेश में बड़ा हो और हुसैन की कहानी सुन उसे लिखने की कोशिश करे. कल्पनाशीलता उसका साथ नहीं दे पाएगी. यह सब बदल चुका है. सीमेंट के मकान, बेतरतीब अतिक्रमण, कल्पनाहीन, अव्यावहारिक बदलाव इन्दौर शहर ही नहीं बल्कि आज़ाद हिन्दुस्तान के शहरी विकास की पहचान बन चुके हैं. इसमें अब किसी भी शहर का चरित्र दूसरे से अलग नहीं नज़र आता. जिन पारसी मोहल्ले की गलियों से हुसैन गुज़रते थे, वे गलियाँ अब वहाँ नहीं हैं. अब मुझे खुद भी पहचान में नहीं आता है कि यह कौन-सी जगह है.
‘मक़बूल’ की भाषा, मक़बूल के जीवन-रूप के नज़दीक चली गयी. यह इसलिये भी सम्भव हो सका कि मैंने उन सब जगहों को देखा-जाना और पहचाना हुआ था जिनकी बात हुसैन कर रहे हैं. जब वे चिमनी बनाने के कारखाने में दादा की बात कर रहे हैं तो वह वहाँ है. वह पूरी एक गली है जहाँ ये सारी दुकानें हैं. उन दुकानों में हम लोग जाया करते थे और घण्टों खड़े हो, यह सब देखा करते थे. सब कुछ एक जादू की तरह होता था. कोई बहुत बूढ़ा व्यक्ति कुशलता से किसी चीज़ से कोई और चीज़ बना देता था. यह सब बातें ‘मक़बूल’ के पक्ष में जा सकीं. स्मृति के आधार पर ही पुस्तक लिखी गयी. अध्याय इतने ही लिखे और इतने ही रहे, कोई अध्याय जोड़ा न कम किया गया. पुस्तक का वर्तमान स्वरूप उन्हीं के साथ बातचीत में बनाया गया है. उनका आग्रह था कि इस पाठ के साथ मैं अपने रेखांकन करूँ. अमूर्त रेखांकन जिनका कहानी के साथ कोई संबंध न हो. मेरा उनसे यह आग्रह था कि वे स्वयं रेखांकन करें. फिर एक बार तय हुआ कि हर अध्याय के लिए पहला वे और बाक़ी के रेखांकन मैं करूँगा.
सालों बाद जब दुबई में मुलाक़ात हुई तब उन्होंने कहा कि मैं इस पुस्तक के लिए नये रेखांकन करना चाहता हूँ. मैं खुश हुआ. यही मैं चाहता भी रहा हूँ. हाल ही में मैं लन्दन इसी उद्देश्य से गया भी लेकिन उनकी व्यस्तता के कारण रेखांकन बन नहीं सके. यह सम्भवतः पहली किताब है जिसमें हुसैन ने कुछ भी न किया हो वरना वे अपनी हर किताब के प्रकाशन में कुछ न कुछ हस्तक्षेप ज़रूर रखते हैं. अब ‘मक़बूल’ में यह सम्भव होता नज़र आ रहा है कि मक़बूल का हस्तक्षेप नहीं है.
*यह आलेख, राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'मक़बूल' की भूमिका का अंश है.
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