यही होता रहा है कला महाविद्यालयों में
संपादक;
कला के शिक्षक -
कला के शिक्षकों का अपना
क्रिएटीव चरित्र होता रहा है जिससे कलाएं पनपती हैं पल्लवित होती हैं और तेजी से विक्सित होती हैं, पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम कालेजों में कला की शिक्षा उच्च संस्थाओं में विभिन्न स्तर पर पढाई जाती है, जिसमें बी.ए. और एम्.ए. की पढ़ाई होती है, सारा जोर पी-एच.डी. पर होता है . बी.ए. पास बच्चा लाइन खींचना नहीं जानता है, बताते हैं टीचर नक़ल के लिए कुछ चित्र दे देता है उसे ही बच्चे बना लेते हैं और बी.ए. हो जाते हैं। कई जगह इसी तरह से मास्टर डीग्री हासिल करता है और फिर उन्हीं महानुभाओं से पी-एच.डी.
हमारे यहाँ आजकल यही आ जाते हैं एम्.ए. करने जिन्हें न तो ये पता होता है कि ड्राइंग क्या है और स्केच क्या होता है ? भविष्य में पी-एच.डी. का अरमा पाले।
और अफ़सोस होता है ये नहीं जानते की भारतीय कला क्या होती है, चित्रकला के बारे में तो कई शिक्षक भी नहीं जानते की भारतीय चित्रकला क्या है, यह तो ऐसे इलाके की चित्रकला की शिक्षा का लेबल है जहाँ सब कुछ तो है पर कला नहीं है।
अब क्या हो ?
कला के शिक्षकों का अपना क्रिएटीव चरित्र होता रहा होगा यहाँ तो चरित्र ही नहीं है एकदम लम्पट और मुर्ख जिन्ह न तो यही पता है की भारतीय कला एक आदर्श रूप में जानी जाती रही है और हर समय की कथा संजोये इतिहास के गौरव को जिन्दा रखे हुए है, यह गौरवशाली इतिहास है इन्ही शिक्षकों के कंधे पर है।जो शोध करते नहीं हैं कराते हैं उनको जिनको वे नक़ल के चित्र और नक़ल के नोटों पर परीक्षाओं में 94%तक अंक दिए होते हैं उन्हें ये नहीं पता होता है कि भारतीय चित्रकला क्या है।
दोष किसका-
कुछ भी कर लें लेकिन वो दोषी नहीं हैं जो कला के शिक्षकों के रूप में केवल दिहाड़ी मजदूर की तरह काम पर आते हैं बस फरक इतना होता है की ये साज़ धज कर आते हैं और पूरी कक्षा को अपने जैसा बनाने का पूरा यत्न करते हैं। क्योंकि इनके गुरूजी ने ही इन्हें ऐसा बनाया है। इनसे टेक्निक की बात करना बेमानी है। ये कुछ तो नहीं जानते इनसे जलरंग की बात कर लीजिये - नदारद, तेल रंग की बात करिए महानतम उत्तर, बाकी की तो बात मत करिए।
कैसे सुधरे परिवेश-
अपना क्रिएटीव चरित्र बनाना होगा और छात्रों को पहले अपना हुनर दिखाना होगा यही होता रहा है कला महाविद्यालयों में, डिमास्ट्रेशन हर एक को अन्यथा वही कहानी बाप ने बनाया बेटे ने अपनाया और अब नाती पोते सब वही इस्तेमाल कर रहे हैं। जब तक हम आगे नहीं आयेंगे तब तक यह परिवेश नहीं सुधरेगा और न ही छात्र रूचि लेगा,हमें यह भी तय करना होगा की हम उन्हें एकेडेमिक के नाम पर क्या परोस रहे हैं !
परीक्षक महानुभाव -
(पी-एच.डी.से बी.ए. तक ) एक तो पुरे समय आते नहीं हैं या आ गए हैं तो निकलने की जल्दी है यही हाल है
(पी-एच.डी.से बी.ए. तक ) एक तो पुरे समय आते नहीं हैं या आ गए हैं तो निकलने की जल्दी है यही हाल है
सरेआम भ्रष्टाचार हो रहा है किसी की नज़र नहीं है। मुझे तो कई बार ये महशुस हुआ है की हमने अच्छे और भले लोगों को अलग कर रखा है काम चलायुं और घटिया लोगों को ही जोड़ रखा है।इससे अलग आप चल ही नहीं सकते हो , विश्वविद्यालय ऐसे लोगों की सूचि बनाकर रखा है जिसमें लोग एक दिन भी नहीं आना चाहते,आ भी गए तो तीन कोड की परीक्षा अकेले कराते हैं, यह अकेले मेरठ युनिवेर्सिटी में होता है।
क्रमशः .............
क्रमशः .............
यहाँ हम
आधे दलित का दुःख
कहानी संग्रह से साभार निम्न कहानी ले रहे हैं जिस कहानी का नाम है
उच्छिष्ट
आधे दलित का दुःख
कहानी संग्रह से साभार निम्न कहानी ले रहे हैं जिस कहानी का नाम है
उच्छिष्ट
जिसके लेखक हैं श्री उमराव सिंह जाटव
जो चित्रकला के विद्यार्थी रहें हैं और अपने अनुभव को उन्होंने इस कहानी के माध्यम से कहा है यद्यपि कहानी के सारे पात्रों का नाम काल्पनिक है !
(मैं उन जातिवादी, महाभ्रष्ट और दुराचारी शिक्षकों को यह कहानी समर्पित करता हूँ जिससे आने वाली पीढियां इससे सबक लेकर अपना जीवन वर्बाद न होने दें)
(मैं उन जातिवादी, महाभ्रष्ट और दुराचारी शिक्षकों को यह कहानी समर्पित करता हूँ जिससे आने वाली पीढियां इससे सबक लेकर अपना जीवन वर्बाद न होने दें)
वैसे तो जाटव साहब सेना के बड़े अधिकारी रहे हैं लेकिन वे
चित्रकला विभाग के विद्यार्थी भी रहे हैं जिसमें अपने समय के कला विभाग के बारे में जो उनका उल्लेख है
उसे पढ़कर ही देखें ;
-----------------------------------------------------------
कला प्रेमियों ये हैं सच्चाई....कला और संस्कृति को ऐसे क्यों नष्ट किया जा रहा हैं...किसे दोष दे हम ...राज्य के कला महाविद्यालयों में चित्रकला व्याख्याताओं के खाली पदों की संख्या अभी पता कर रहे हैं...और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में इस समय चित्रकला व्याख्याता के 117 पद खाली हैं...माध्यमिक में तो ये संख्या हजारों में हैं...और सरकार पैसे बचाने में लगी हैं...
इसी तरह की एक लंबी कहानी है जिसे पढ़कर आपको कला शिक्षा में भ्रष्टाचार का अंदाज़ा लग जाएगा -













































कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें