जवानी में संघर्ष: टाटा झोंकते थे भट्टी में कोयला, मुकेश अंबानी को छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
dainikbhaskar.com | Mar 24, 2013, 08:00AM IST
हर इंसान सफल होना चाहता है. लेकिन इसके लिए कोई जादू की छड़ी आज तक बनी नहीं. ना ही कोई जिन्न हुआ जो आपकी आज्ञा मान ले और आपको रातों-रात सफल बना दे. यह ऐसी चीज है, जिसके लिए आपको कड़ी मेहनत और लगन की जरूरत होती है. तभी आपकी सफलता और उसके लिए किए गए संघर्ष की कहानियां लोग सुनते-सुनाते हैं, पढ़ते हैं.
रतन टाटा, मुकेश अंबानी, मार्क जुकरबर्ग को आज कौन नहीं जानता? टाटा को इंडियन कंपनी से मल्टी-नेशनल कंपनी बनाने का श्रेय रतन टाटा को ही जाता है. भारत के सबसे धनी इंसान मुकेश अंबानी को अपने पिता की कपड़ा कंपनी को भारत की सबसे बड़ी कंपनी बनाने के लिए जाना जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेट्वर्किंग साइट फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग अब इतने फेमस हो चुके हैं कि उन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं. लेकिन क्या ये सारे लोग पैदा होते ही सफलता का स्वाद चख चुके थे? या इनकी सफलता के पीछे इनका संघर्ष, इनका परिश्रम और इनकी लगन है?
आज अपने पाठकों को दुनिया भर में अपनी सफलता का लोहा मनवाने वाले ऐसे ही कुछ चुनिंदा लोगों की जवानी के किस्से बता रहा है. आगे की स्लाइड्स में इन लोगों की सफलता के अलावा इनके संघर्ष की दास्तान भी बताई गई है.
रतन टाटा
28 दिसंबर 1937 को जन्मे रतन टाटा के पिता नवल टाटा और उनकी मां सोनी थीं. रतन जब मात्र 7 साल के थे, तो इनके माता-पिता का तलाक हो गया था. इनका पालन-पोषण इनकी दादी नवजबाई ने की थी.
इनकी शिक्षा-दीक्षा बॉम्बे के कैम्पियन स्कूल और शिमला के बिशप कॉटन स्कूल से हुई थी. इन्होंने अपना ग्रैजुएशन कोर्नेल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में किया था. जेआरडी टाटा की सलाह पर इन्होंने आइबीएम में मिल रहे जॉब को छोड़ दिया था.
1962 में 25 साल की उम्र में इन्होंने टाटा ज्वाइन किया. शुरूआती दिनों में इन्हें टाटा स्टील के बलास्ट फर्नेस में कोयला और चूना पत्थर झोंकने का काम दिया गया था. तब कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह इंसान दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का सपना देखेगा और उसे पूरा भी करेगा.
मुकेश अंबानी
दोनों अंबानी भाईयों में बड़े भाई मुकेश का जन्म 1957 में हुआ था. 70 के दशक तक पूरा अंबानी परिवार दो कमरे के फ़्लैट में रहता था. इनकी स्कूली पढ़ाई हील ग्रैंग हाई स्कूल, मुंबई से हुई थी. इसके बाद बॉम्बे यूनिवर्सिटी से इन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग की.
1980 में अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रहे मुकेश को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. इसके पीछे वजह थी, अपने पिता धीरुभाई अंबानी को पॉलिस्टर फिलामेंट यार्न के मैनुफेक्चरिंग प्लांट खोलने में मदद करना.
मार्थ स्टेवार्ट
मार्थ स्टेवार्ट एक जानी मानी शेयर ब्रोकर थीं। मार्था का नाम आज हर अमेरिकन जानता है। दरअसल मार्था पांच सालों तक वॉल स्ट्रीट में स्टॉक ब्रोकर के रूप में काम कर चुकी हैं। वो मॉडल भी रह चुकी हैं। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो शेयरब्रोकर बन कर काफी अच्छी शिक्षा प्राप्त की हैं।

