रविवार, 24 मार्च 2013

संघर्ष की दास्तान


जवानी में संघर्ष: टाटा झोंकते थे भट्टी में कोयला, मुकेश अंबानी को छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई

dainikbhaskar.com  |  Mar 24, 2013, 08:00AM IST

जवानी में संघर्ष: टाटा झोंकते थे भट्टी में कोयला, मुकेश अंबानी को छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
हर इंसान सफल होना चाहता है. लेकिन इसके लिए कोई जादू की छड़ी आज तक बनी नहीं. ना ही कोई जिन्न हुआ जो आपकी आज्ञा मान ले और आपको रातों-रात सफल बना दे. यह ऐसी चीज है, जिसके लिए आपको कड़ी मेहनत और लगन की जरूरत होती है. तभी आपकी सफलता और उसके लिए किए गए संघर्ष की कहानियां लोग सुनते-सुनाते हैं, पढ़ते हैं. 
 
रतन टाटा, मुकेश अंबानी, मार्क जुकरबर्ग को आज कौन नहीं जानता? टाटा को इंडियन कंपनी से मल्टी-नेशनल कंपनी बनाने का श्रेय रतन टाटा को ही जाता है. भारत के सबसे धनी इंसान मुकेश अंबानी को अपने पिता की कपड़ा कंपनी को भारत की सबसे बड़ी कंपनी बनाने के लिए जाना जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेट्वर्किंग साइट फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग अब इतने फेमस हो चुके हैं कि उन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं. लेकिन क्या ये सारे लोग पैदा होते ही सफलता का स्वाद चख चुके थे? या इनकी सफलता के पीछे इनका संघर्ष, इनका परिश्रम और इनकी लगन है?
आज अपने पाठकों को दुनिया भर में अपनी सफलता का लोहा मनवाने वाले ऐसे ही कुछ चुनिंदा लोगों की जवानी के किस्से बता रहा है. आगे की स्लाइड्स में इन लोगों की सफलता के अलावा इनके संघर्ष की दास्तान भी बताई गई है.
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जवानी में संघर्ष: टाटा झोंकते थे भट्टी में कोयला, मुकेश अंबानी को छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
रतन टाटा 
 
28 दिसंबर 1937 को जन्मे रतन टाटा के पिता नवल टाटा और उनकी मां सोनी थीं. रतन जब मात्र 7 साल के थे, तो इनके माता-पिता का तलाक हो गया था. इनका पालन-पोषण इनकी दादी नवजबाई ने की थी. 
इनकी शिक्षा-दीक्षा बॉम्बे के कैम्पियन स्कूल और शिमला के बिशप कॉटन स्कूल से हुई थी. इन्होंने अपना ग्रैजुएशन कोर्नेल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में किया था. जेआरडी टाटा की सलाह पर इन्होंने आइबीएम में मिल रहे जॉब को छोड़ दिया था. 
 
1962 में 25 साल की उम्र में इन्होंने टाटा ज्वाइन किया. शुरूआती दिनों में इन्हें टाटा स्टील के बलास्ट फर्नेस में कोयला और चूना पत्थर झोंकने का काम दिया गया था. तब कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह इंसान दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का सपना देखेगा और उसे पूरा भी करेगा.


जवानी में संघर्ष: टाटा झोंकते थे भट्टी में कोयला, मुकेश अंबानी को छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
मुकेश अंबानी 
 
दोनों अंबानी भाईयों में बड़े भाई मुकेश का जन्म 1957 में हुआ था. 70 के दशक तक पूरा अंबानी परिवार दो कमरे के फ़्लैट में रहता था. इनकी स्कूली पढ़ाई हील ग्रैंग हाई स्कूल, मुंबई से हुई थी. इसके बाद बॉम्बे यूनिवर्सिटी से इन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग की. 
 
1980 में अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रहे मुकेश को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. इसके पीछे वजह थी, अपने पिता धीरुभाई अंबानी को पॉलिस्टर फिलामेंट यार्न के मैनुफेक्चरिंग प्लांट खोलने में मदद करना.
 
जवानी में संघर्ष: टाटा झोंकते थे भट्टी में कोयला, मुकेश अंबानी को छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
मार्थ स्टेवार्ट 
 
मार्थ स्टेवार्ट एक जानी मानी शेयर ब्रोकर थीं। मार्था का नाम आज हर अमेरिकन जानता है। दरअसल मार्था पांच सालों तक वॉल स्ट्रीट में स्टॉक ब्रोकर के रूप में काम कर चुकी हैं। वो मॉडल भी रह चुकी हैं। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो शेयरब्रोकर बन कर काफी अच्छी शिक्षा प्राप्त की हैं।
 


सबसे कट्टर मुग़ल शासक, सभी खेलते थे रंगों की होली!


अकबर, जहांगीर या फिर सबसे कट्टर मुग़ल शासक, सभी खेलते थे रंगों की होली!

Gagan Gurjar  |  Mar 22, 2013, 01:59AM IST



अकबर, जहांगीर या फिर सबसे कट्टर मुग़ल शासक, सभी खेलते थे रंगों की होली!
27 मार्च को होली का त्यौहार है।वैसे तो होली का त्यौहार पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन इस त्यौहार में रंगों के साथ - साथ देखने को मिलती हैं कुछ परम्पराएं जो सहसा ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं।dainikbhaskar ,com अपने पाठकों के लिए लाया है एक सीरीज, जिसके तहत होली की विभिन्न परम्पराओं और ऐतिहासिक तथ्यों से आपको रूबरू कराया जाएगा।इस सीरीज की आज की कड़ी में पेश है मुग़ल काल के कुछ उदाहरण जो साबित करते हैं उस समय भी खेली जाती थी होली..
पढ़िए, मुग़ल काल की होली के कुछ उदाहरण...
रंगों का त्यौहार होली पूरी दुनिया में अपने अनोखे अंदाज के लिए जाना जाता है।कहते हैं कि इस दिन रंगों में रंग ही नहीं मिलते बल्कि दिल भी आपस में मिल जाते हैं। फिल्म शोले के एक सुप्रसिद्ध गाने के बोल भी इसी ओर इशारा करते हैं।हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार हर वर्ष फाल्गुन माह में होली का त्यौहार मनाया जाता है, इस माह की पूर्णिमा को पूरी दुनिया में होली पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।

मान्यता के अनुसार होली पूर्णिमा के दिन हिरणकश्यपू नाम के राक्षस ने अपने पुत्र प्रहलाद को होलिका की गोद में बिठाकर आग लगा दी थी लेकिन इस आग में होलिका जलकर भस्म हो गई और भगवान विष्णु का भक्त होने के कारण प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ जबकि होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था।तभी से होली पूर्णिमा के दिन होलिका दहन की परंपरा चल निकली।होलिका दहन की इस परंपरा और कथा के बारे में सभी जानते हैं।

होली खेलने की परंपरा कोई आधुनिक परंपरा नहीं है इसका उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों नारद पुराण, भविष्य पुराण में मिलता है।कुछ प्रसिद्ध पुस्तकोंजैसे जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र में भी होली पर्व के बारे में वर्णनं किया गया है।

आगे की स्लाइड्स में जानिए, मुग़ल काल में कैसे खेली जाती थी रंगों की होली....


अकबर, जहांगीर या फिर सबसे कट्टर मुग़ल शासक, सभी खेलते थे रंगों की होली!


औरंगजेब के बारे में लोगों की राय है कि वह बहुत ही कट्टर पृवृत्ति का शासक था लेकिन शायद यह कम ही लोग जानते होंगे कि औरंगजेब को भी रंगों से बहुत प्यार था और उसके समय में लोग अलग-अलग टोलियां  बनाकर रंगों के इस त्यौहार का लुत्फ़ उठाया करते थे।औरंगजेब की होली  का वर्णन स्टेनले लेन पूल की पुस्तक औरंगजेब में मिलता है।

गुरुवार, 14 मार्च 2013

अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद -2013


अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद -2013





ने गाजियाबाद को बहुत कुछ दिया है जिसमें लगभग 50 पेंटिंग्स और 12 मूर्तिशिल्प 

जिसमें कुछ तो तैयार हो गए हैं और कुछ तैयार होने की प्रक्रिया में हैं 
.
पद्मश्री वी राम सुतार, श्री उदय प्रताप सिंह और श्रीमती चित्रा मुद्गल ने इस उत्सव की जैसी अवधारणा की
अपेक्षा की थी, उसे समापन अवसर पर प्रोफेसर राम गोपाल यादव ने जिस तरह से सराहा और उत्तर प्रदेश

में कला के इन आयामों को बढ़ने की बात की उससे कलाकारों, कलाप्रेमीयों, कलाविद्यार्थियों,विविध 

संस्कृतिकर्मियों एवं आयोजकों को जिस तरह का साहस मिला, उससे पूरे कार्यक्रम के संयोजकत्व का 

उत्तरदायित्व निर्वहन से आई थकान छू हो गयी है।

श्री संतोष कुमार यादव (संरक्षक-अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद -2013) अध्यक्ष/उपाध्यक्ष - 

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण गाजियाबाद के साथ जिस सपने को बुना था उसे वही यह रूप दे सकते हैं 

यह पुनः तय हो गया अन्यथा 'कलाधाम' के उपयोगिता पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया था। सांस्कृतिक उत्थान 

के 'कलाधाम' के जिस दूसरे चरण की घोषणा उन्होंने "मूर्तिकला पार्क" के रूप में की है वह निश्चित तौर पर 

जिले की शकल सवारने में कामयाबी दिलाएगा। 

श्री एस वी एस रंगा राव-जिलाधिकारी ने जिस तरह की रुचि इन कलाओं में ली है, उससे जनपदवासियों में 

कलाओं के प्रति बड़ा सन्देश जाएगा .

इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में जिस तरह से व्यवस्था को श्री डी . पी . सिंह विशेष कार्य अधिकारी - 

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण गाजियाबाद ने ली और अपने सहयोगियों को निर्देशित किये उससे 

प्राधिकरण की नई कार्यप्रणाली सम्मुख आयी .

तमाम खट्टे मीठे अनुभवों को समेटे उनलोगों ने जिन्हें कला समझ आती हो या न आती हो उनका भी 

योगदान रहा और उसी में वह भी जुटे रहे।

मेरे विद्यार्थियों एवं मित्रों ने जिस तरह का सहयोग दिया वह हमेश स्मरणीय रहेगा।



इस बार के कला उत्सव की कई उपलब्धियां रहीं जिनमे प्रमुख रूप से 

मिडिया को कई एंगेल से लोगों ने संभाला की उसका रुझान कला के उत्कर्ष पर केन्द्रित होने के बजाय इधर 
उधर की चिंताओं को लेकर अधिक/ज्यादा चिंता को उजागर किया।
इस बार के कला उत्सव में देश भर से आये कलाकारों ने जिस तरह से काम किया उससे यह देश के किसी भी कला कार्यशाला को पीछे छोड़ने में कामयाब रहा .
एम् एम् एच कालेज के निकले छात्रों की मौलिक रचनाओं ने लोगों का ध्यान केन्द्रित करने में कामयाबी हासिल की . कार्यशाला का इंतजाम भी चित्रकला के विद्यार्थियों ने बखूबी संभाला .
प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव ने गाजियाबाद को कला के क्षेत्र में अग्रणी होने की उम्मीद जताई . 
उत्सव के संरक्षक श्री संतोष कुमार यादव एवं उनके सहयोगियों ने हर मोड़ पर इसे नायब होने की शक्ल दी 
कार्यक्रम के संयोजकत्व के नाते इस तरह का एहसास होता रहा, पर सुखद यह है की तमाम साजिशों और बदतमीजियों के बावजूद समारोह की गरिमा प्रभावित नहीं हुयी . पूरा कार्यक्रम कला सृजन की प्रक्रिया को प्राप्त किया .



रचनाधर्मिता की अनुभूति और अलौकिक सत्य का सृजन अनुकृति से नहीं चिंतन मनन और ह्रदय के गर्भ से नि;सृत होता है,एहसास की कमी और मन की उछ्रिन्खलता से अक्सर रचनाएँ जड़वत हो जाती हैं जिस सृजन प्रक्रिया ने इस शहर में पिछले दिनों कई दिनों तक चली, लोगों के मन मोह ली, ये केवल तात्कालिक नहीं हैं बल्कि युगों युगों तक इनका असर रहेगा, जिन मनीषियों ने इस विचार का समर्थन किया है निश्चित तौर पर वह सांस्कृतिक इतिहास रच रहे हैं, उन्हें आने वाली पीढियां नमन करेंगी .

-डॉ.लाल रत्नाकर