कला शिक्षा के जिस मुकाम पर आज के विद्यालय पहुंचे हैं वहां से आगे जाना वास्तव में भयावह है .
इस बीच कई विद्यालयों में परीक्षक के नाते जाने का मौका मिला जैसी स्थितियां वहां की हैं उसका कोई अंदाज़ा लगना भी शायद ही संभव हो.
बिना शिक्षक के विषय चलाये जा रहे हैं, पाठ्यक्रम तक का तो ज्ञान ही नहीं है.
भगवान ही मालिक है .

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