चंचल जी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं, कला के मर्मज्ञ हैं लिखते तो कमाल के हैं -
एक रिपोर्ताज आप भी पढ़िए -
(उनके फेसबुक से साभार)
मै अपने गाँव के चौराहे पर बैठा हूँ ,गांवों में चौराहों का चलन सरकारी 'विकास ' की देन है .कल तक यहाँ पग्दंदियाँ थी ,धुल भरी ,कीचड से भरी ,बचपन में हम इस डगर से मदरसा जाते थे ,बस्ता लेकर .आज यहाँ सड़क है गद्धेवाली . नवल उपाधिया किसी गड्ढे में गिर गए हैं सुथना भीग गया है प्लास्टिक के जूते में कीचड भर गया है साईकिल चिमटा टूट गया है ..साईकिल कंधे पर लादे सड़क को गरिआते चले आ रहें हैं .उमर दरजी जनम का मुरहा है ,बर् बखत कुबोल बोलता है -'नवल भैया ! मछली के शिकार पे .. ' नवल का गुस्सा और बढ़ गया ' तेरी मा ...की ...इन्हां ... फटी पडी है .. औ मल्हार गा रहें हो ..इ सड़क एकरी मा की ...कयूम टुकड़ा लगाया ,'सड़क की मा ?' इ कैसी है .. ? नवल एक साथ सबको गरियाते हुए उधर बढ़ गए जहां साईकिल की मरम्मत होती है .सड़क पर चिखुरी चालू हो गए - सरकार ने सड़क दिया ,खलिहान का माल मंडी जाए .मामला उलट गया ...शहर का कचड़ा गाँ में आगिरा .चिप्स ,कुरमुरे ,मह्कौअवा साबुन ... कहाँ तक गिनाई ? बिजली आयी छोटा मोटा रोजगार लगता लेकिन बची खुची इज्जत भी गिरवी रख दी गयी ,रानी मुखर्जी कुरमुरे खायेगी ,ऐशौर्या राय अपनी खूबसूरती का राज साबुन को बताएगी . त गाँव क लछमिनिया उहै साबुन खरीदी .... जा रे ज़माना ...' बिकास पर बहस जारी है मै आसरे की चाय की दूकान पर बैठा चिखुरी को निहार रहा हूँ

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