शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

एक रिपोर्ताज आप भी पढ़िए -


Photo: मै अपने गाँव के चौराहे पर बैठा हूँ ,गांवों में चौराहों का चलन सरकारी 'विकास ' की देन है .कल तक यहाँ पग्दंदियाँ थी ,धुल भरी ,कीचड से  भरी ,बचपन में हम इस डगर से मदरसा जाते थे ,बस्ता लेकर .आज यहाँ सड़क है गद्धेवाली . नवल उपाधिया किसी गड्ढे में गिर गए हैं सुथना भीग गया है प्लास्टिक के जूते में कीचड भर गया है साईकिल  चिमटा टूट गया है ..साईकिल कंधे पर लादे सड़क को गरिआते चले आ रहें हैं .उमर दरजी जनम का मुरहा है ,बर् बखत कुबोल बोलता है -'नवल भैया ! मछली के शिकार पे ..  ' नवल का गुस्सा और बढ़ गया ' तेरी मा ...की ...इन्हां ... फटी पडी है .. औ  मल्हार गा रहें हो ..इ सड़क एकरी मा की ...कयूम टुकड़ा लगाया ,'सड़क की मा ?' इ कैसी है .. ? नवल एक साथ सबको गरियाते हुए उधर बढ़ गए जहां साईकिल की  मरम्मत होती है .सड़क पर चिखुरी चालू हो गए - सरकार ने सड़क दिया ,खलिहान का माल मंडी जाए .मामला उलट गया ...शहर का कचड़ा गाँ में आगिरा .चिप्स ,कुरमुरे ,मह्कौअवा साबुन  ... कहाँ तक गिनाई ? बिजली आयी छोटा मोटा रोजगार लगता लेकिन बची खुची इज्जत भी गिरवी रख दी गयी ,रानी मुखर्जी कुरमुरे खायेगी ,ऐशौर्या राय अपनी खूबसूरती का राज साबुन को बताएगी . त गाँव क लछमिनिया उहै साबुन खरीदी .... जा रे ज़माना ...'  बिकास पर बहस जारी है मै आसरे की चाय की दूकान पर बैठा चिखुरी को निहार रहा हूँ

चंचल जी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं, कला के मर्मज्ञ हैं लिखते तो कमाल के हैं -
एक रिपोर्ताज आप भी पढ़िए -
(उनके फेसबुक से साभार)

रविवार, 22 जुलाई 2012

ब्रिटेन में कालों का लंबा इतिहास


 रविवार, 22 जुलाई, 2012 को 10:18 IST तक के समाचार
हेनरी सप्तम और हेनरी अष्टम के बिगुल वादकों में एक काला बिगुल वादक भी था
ब्रिटेन की सड़कों पर चलते हुए आपको दुनिया के अलग अलग देशों से आए अलग अलग नस्लों के लोग सड़कों पर घूमते मिल जायेगें.
आम धारणा है कि ब्रिटेन में अश्वेत नीग्रो लोग कैरेबियाई देशों से 1948 के बाद आए, बांग्लादेशी 1971 की लड़ाई के बाद आए और युगांडा के एशियाई 1972 में तानाशाह ईदी अमीन द्वारा देश निकाला दे देने के बाद ब्रिटेन आए.

पर शोध से पता लगता है कि ब्रिटेन में दुनिया भर की अलग अलग नस्लों से लोग शताब्दियों से रह रहे हैं.
सत्रहवीं शताब्दी में शेक्सपीयर के ज़माने में भी ब्रिटेन की सड़कों पर घूमते हुए आपको बंगाली या काले लोग मिल सकते थे.
पर उनकी तादाद आज जितनी नहीं थी. जिन लोगों ने पहले कभी अश्वेत को नहीं देखा था उनमे से कई इन्हें देख कर आकर्षित होते थे, कई चिढ़ते थे.

पुराना दौर

पर काले या एशियाई मूल के लोग उस दौर में ब्रिटेन में गुलाम नहीं थे , हाँ वो समाज के सबसे ऊँचे तबकों में भी शामिल नहीं थे.
उस ज़माने में यह लोग ज़्यादातर घरों में नौकरियां करते थे या संगीतकार, कलाकार होते थे.
ब्रिटेन में रोमन काल में भी काले लोग होते थे लेकिन एक बहुत बड़ी तब्दीली आई 17वीं शतब्दी में महारानी एलिजाबेथ प्रथम के दौर में.
महारानी एलिजाबेथ के ज़माने के ब्रिटेन के पुराने अभिलेखों में झाँकने पर बहुत से काले लोगों की दास्तानें मिलती हैं.
शेक्सपीयर के कम से कम दो नाटकों में अहम् काले किरदार हैं. इस बात से जाहिर होता है कि उस ज़माने के लंदन में काले लोग समाज का हिस्सा थे.
अध्ययन से पता लगता है कि उस ज़माने में ज़्यादातर काले घरों में नौकरियां कर के या लोगों का मनोरंजन कर के अपना जीवन व्यतीत करते थे.
लंदन में काले लोगों के तादाद कुछ नहीं तो सैंकड़ों में तो रही ही होगी.
उदहारण के तौर पर पादरियों के रिकॉर्ड जाचने से पता लगता है कि साल 1599 में परसेंट ओलाव हार्ट स्ट्रीट पर जोहन कर्त्में नाम के एक सज्जन का ज़िक्र मिलता है जिन्होंने एक काली महिला जो की नौकर थी उसके साथ शादी कर ली.
कुछ समय बाद एक 'काले ईसाई' जेम्स कर ने मार्गरेट पर्सन नाम की एक श्वेत महिला के साथ ब्याह रचा लिया.

कालों की जिंदगी

लंदन के चर्चों के इतिहास को देखने से पता लगता है कि 16वीं शताब्दी में भी कई काले लोग शहर के अलग अलग इलाकों में बसते थे.
कुछ कागजातों पर नज़र डालने से पता लगा कि कुछ कालों को नौकर होने के बावजूद बहुत ही सम्मान के साथ बड़े अमीर लोगों की तरफ़ दफनाया गया और ख़र्च उनके मालिकों ने उठाया.
पर ऐसा नहीं था कि हर काले की जिंदगी लंदन में आसान थी.
कई काली महिलायें कई और श्वेत महिलाओं के साथ वैश्यालय में काम करने को मजबूर थीं.
यूँ तो काले लोगों के लंदन में रहने पर ब्रितानी सरकार को कोई आपत्ती नहीं थी लेकिन साल 1600 में उनकी संख्या में अचानक इजाफा होने के बाद हालात बदल गए.
दरअसल स्पेन से लड़ाई के बाद ब्रिटेन ने हमला कर के बहुत से स्पेन के जहाज़ों पर बंदी काले गुलामों को मुक्त कराया और उनमे से बहुत से ब्रिटेन आ गए.
अट्ठारहवीं शताब्दी में इन काले लोगों के साथ बहुत बड़ी संख्या में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के लोग भी जुड़ गए.
इतिहासकारों को अब तक कोई एशियाई लोगों के द्वारा लिखा हुआ वृतांत नहीं मिला है.
लेकिन यह तय है कि ब्रिटेन के इतिहास में काले और एशियाई लोगों की भूमिका कोई नई नहीं है.

शनिवार, 21 जुलाई 2012

क्रिटिसिस्म ऑफ़ द आर्ट


जागरण से साभार

गलत तरीके से संकेत करती बोल्ट की प्रतिमा

Jul 20, 02:35 pm  
लंदन। ब्रिटेन की एक सिटी काउंसिल ने 15,000 पाउंड [23,500 डॉलर] की लागत वाली जमैका के स्टार स्प्रिंटर उसैन बोल्ट की एक प्रतिमा का अनावरण किया लेकिन यह प्रतिमा अनावरण के साथ ही चर्चा का केंद्र बन गई। इस प्रतिमा में विश्व रिकॉर्डधारी बोल्ट की प्रसिद्ध मुद्रा को गलत तरीके से संकेत करते दिखाया गया है।
समाचार पत्र 'द सन' की रिपोर्ट के मुताबिक, बोल्ट की यह प्रतिमा छह फीट ऊंची है जो बर्मिघम सिटी काउंसिल के आदेश पर लकड़ी की तिल्लियों से बनाई गई है। यह फाइबर से बुनी गई है। इस प्रतिमा में पांच बार के विश्व और तीन बार के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता बोल्ट के दाएं हाथ को ऊपर की ओर उठाए हुए दिखाया गया है जबकि बोल्ट हमेशा खुशी से अपना बायां हाथ ऊपर उठाते हैं और तीर तथा कमान की आकृति बनाते हैं।
इस आलोचना के बाद भी काउंसिल बेफिक्र है और उसका कहना है 'अगली बार आप कहेगे कि चेहरा उनकी तरह नहीं लगता।' उल्लेखनीय है कि बोल्ट जब कोई रेस जीतते हैं तो वह खुशी का इजहार भिन्न-भिन्न तरीके से करते है लेकिन उन्हीं में से यह मुद्रा उनकी काफी प्रचलित है। बोल्ट रेस जीतने के बाद अपना बायां हाथ ऊपर और दायां हाथ मोड़कर सीने तक ले आते है, जिससे प्रतीत होता है कि वह तीर तथा कमान की आकृति बना रहे है।

रविवार, 15 जुलाई 2012

क्या फिर लुप्त हो जाएगा मोहनजोदड़ो?

http://www.bbc.co.uk/hindi/pakistan/2012/06/120628_mohenjodaro_ak.shtml

क्या फिर लुप्त हो जाएगा मोहनजोदड़ो?

 गुरुवार, 28 जून, 2012 को 18:08 IST तक के समाचार
पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि वे अपने यहाँ के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल मोहनजोदड़ो के अवशेषों की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. मगर कुछ विशेषज्ञों की राय है कि यदि कुछ बड़े क़दम नहीं उठाए गए तो कांस्य युग की ये ऐतिहासिक धरोहर सदा के लिए लुप्त हो जा सकती है.
4500 साल पुराने एक घर के बीच से गुज़रना एक अभिभूत कर देनेवाला अनुभव है.
ख़ासतौर से तब जब वो घर वैसा ही हो जैसा कि आज के दिनों में होता है, जहाँ आगे और पीछे दो दरवाज़े हों, एक-दूसरे से जुड़े कमरे, साफ़-सुथरी पकी ईंटें, यहाँ तक कि एक साधारण शौचालय और नाले भी.
हैरानी ये सोचकर होती है कि जिस घर की बात हो रही है, वो दो मंज़िलों वाला घर था.
मगर इससे भी अधिक रोमांच तब होता है जब आप कांस्य युग की इस असल गली से गुज़रें और इसके दोनों तरफ़ क़तारों में बने घरों को देखें.
और फिर इन रास्तों से गुज़रते-गुज़रते आप पहुँचें एक जगह जहाँ कभी बाज़ार लगा करता था.
ये शानदार योजनाबद्ध शहर है – मोहनजोदड़ो – दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक.
2600 ईसा पूर्व बना ये शहर, अपनी जटिल योजनाबद्ध व्यवस्था, अविश्वसनीय वास्तुविद और जटिल जल और सफाई व्यवस्था के कारण दुनिया की सबसे विकसित शहरी व्यवस्था वाला शहर हुआ करता था.
समझा जाता है कि महान सिंधु घाटी सभ्यता के इस शहर में 35,000 लोग रहा करते थे.

बदहाली

"जब भी मैं यहाँ आती हूँ, मैं पहले से बुरा अनुभव करती हूँ. मैं यहाँ दो-तीन साल से नहीं आई. और अब जो देख रही हूँ तो ये नुकसान देखकर मेरी छाती फटी जा रही है."
डॉं आसमां इब्राहीम, पुरातत्वविद्
मगर इस शहर के आकार और इसकी चमत्कारी व्यवस्था को देखकर जहाँ मैं अभिभूत था, वहीं मुझे वहाँ ले जानेवाली गाइड, पाकिस्तान की प्रख्यात पुरातत्वशास्त्री, लगभग रोने को हो आईं.
डॉक्टर आसमां इब्राहीम ने कहा,”जब भी मैं यहाँ आती हूँ, मैं पहले से बुरा अनुभव करती हूँ.
"मैं यहाँ दो-तीन साल से नहीं आई. और अब जो देख रही हूँ तो ये नुकसान देखकर मेरी छाती फटी जा रही है."
वे वो स्थान दिखाती हैं जहाँ बड़ी क्षतियाँ हुई हैं.
मोहनजोदड़ो के निचले इलाक़े में, जहाँ कि मध्यवर्ग और कामगार तबके के लोग रहा करते थे, दीवारें नीचे से ऊपर की ओर दरक रही हैं. ये नई क्षति है.
भूमिगत जल में मौजूद लवण ईंटों को खा रहा है जो कि खुदाई से पहले, हज़ारों सालों से सुरक्षित रही थीं.
जैसे-जैसे हम शहर के ऊपरी हिस्सों की ओर बढ़ते हैं जहाँ कि सिंधु घाटी सभ्यता की संपन्न आबादी बसा करती थी, और जहाँ कि बड़े स्नानघर होने के संकेत मिलते हैं, वहाँ हालत और ख़राब लगती है.
कुछ दीवारें पूरी तरह गिर गई हैं, कुछ इसके कगार पर पहुँच गई हैं.
अपने समय में मोहनजोदड़ो एक अतिविकसित सभ्यता का एक अतिविकसित शहर हुआ करता था
डॉक्टर इब्राहीम कहती हैं,"संरक्षण के लिहाज़ से ये निःसंदेह एक जटिल स्थान है जहाँ लवणता, आर्द्रता और बारिश की समस्याएँ हैं."
मगर इनके संरक्षण के अधिकतर प्रयास इतने बेकार और बचकाने हैं कि उनसे नुक़सान और बढ़ा ही है.
इनमें एक उपाय ईंटों के ऊपर मिट्टी की कीचड़ का लेप करना था ताकि ये कीचड़ लवण और आर्द्रता को सोख ले.
मगर एक ओर जहाँ कीचड़ सूखकर टूट गई, वहीं उसने साथ-साथ पुरानी ईंटों के टुकड़ों को भी खींच लिया.
इस स्थान पर ऐसी जगहें भी दिखती हैं जहाँ कि सदियों पुरानी ईंटों के स्थान पर नई ईंटें लगा दी गईं.
मोहनजोदड़ो में म्यूज़ियम तक को लूट लिया गया और वहाँ से कई प्रख्यात चीज़ें चोरी कर ली गईं जिनमें मोहर भी हैं जिनका प्रयोग संभवतः व्यापारी छापे लगाने के लिए करते थे. उनको दोबारा बरामद नहीं किया जा सका.
इस जगह मौजूद एक गाइड ने भी बताया कि उसने इस ऐतिहासिक स्थल की हालत और रख-रखाव में तेज़ गिरावट होते देखा है.
वो कहता है कि हालाँकि अभी भी पाकिस्तानी पर्यटक आते हैं, मगर मोहनजोदड़ो आनेवाले विदेशी पर्यटकों की संख्या बहुत कम रह गई है.

नाकाम सरकारें

"हमें बहुत जल्दी कुछ करना पड़ेगा क्योंकि यदि ऐसा ही चलता रहा तो मेरा अनुमान है कि ये स्थल 20 साल से अधिक नहीं बचा रह सकेगा"
आसमां इब्राहीम
इस ऐतिहासिक धरोहर के साथ हो रहे नुक़सान को रोक पाने में कमज़ोर सरकारी पर्यटन रणनीति सक्षम नहीं हो पा रही.
पहले कई दशकों तक इसकी देख-रेख का ज़िम्मा पाकिस्तान सरकार पर था मगर हाल के समय में ये दायित्व सिंध की प्रांतीय सरकार को सौंप दिया गया.
सिंध सरकार ने अब इस स्थल के उद्धार के लिए एक तकनीकी टीम का गठन किया है.
डॉक्टर इब्राहीम कहती हैं,”हमें मोहनजोदड़ो की रक्षा के लिए हर क्षेत्र के लोगों की बात सुननी पड़ेगी.
"ये सही है कि वहाँ लवणता है. मगर स्थानीय किसान इसका इलाज जानते हैं. फिर हम क्यों नहीं?
"मगर हमें बहुत जल्दी कुछ करना पड़ेगा क्योंकि यदि ऐसा ही चलता रहा तो मेरा अनुमान है कि ये स्थल 20 साल से अधिक नहीं बचा रह सकेगा."
एक राहत की बात ये है कि शहर का कुछ हिस्सा अभी भी खोदा जाना बाकी है और इस तरह से वो सुरक्षित है.
कुछ विशेषज्ञों ने तो यहाँ तक कहा है कि पूरे के पूरे मोहनजोदड़ो को ही फिर से ढंक देना चाहिए ताकि और नुकसान ना हो.
और ये उन लोगों की हताशा का परिचायक है जो मोहनजोदड़ो को प्यार करते हैं और जिन्हें उस स्थल को नुक़सान होता देख पीड़ा हो रही है जो अपने समय में मिस्र, मेसोपोटामिया और चीन जैसी प्राचीन सभ्यताओं से टक्कर लिया करता था.