शनिवार, 5 मई 2012

बच्चे अब पढ़ेंगे ईमानदारी का पाठ


अन्ना इफेक्ट: बच्चे अब पढ़ेंगे ईमानदारी का पाठ

बृजेश सिंह/नई दिल्ली
Story Update : Sunday, May 06, 2012    12:22 AM
Anna effects children read text of honesty
बच्चों को अब विभिन्न विषयों के साथ ही स्कूलों में नैतिक मूल्य, सत्यनिष्ठा तथा ईमानदारी का भी पाठ पढ़ाया जाएगा। सीबीएसई एवं सीआईएससीई ने इसके लिए बोर्ड से जुड़े सभी स्कूलों को एक परिपत्र जारी कर सत्यनिष्ठा क्लब स्थापित करने को कहा है। इस क्लब को शुरू करने का विचार पिछले साल समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान अफसरों के दिमाग में आया था। अब इस पर अमल शुरू करने की पहल हो रही है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 में जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का आंदोलन अपने शबाब पर था उन्हीं दिनों केंद्रीय सतर्कता आयोग ने विभिन्न विभागों के प्रमुखों के साथ दिल्ली में एक बैठक की थी। जुलाई में हुई बैठक को वैसे तो समीक्षा बैठक नाम दिया गया था लेकिन अन्ना के आंदोलन के प्रभाव के चलते इस बैठक में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर खुलकर चर्चा हुई थी। इसी बैठक में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से स्कूलों में सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारी का पाठ पढ़ाने के तरीके ढूंढने को कहा गया था।

पहले से किसी न किसी रूप में स्कूली शिक्षा में उच्च नैतिकता से जुड़े पाठ्यक्रम को हिस्सा बनाया जाता रहा है। इसके अलावा नेशनल एजुकेशनल फ्रेमवर्क 2005 में भी सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों को बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम को स्कूलों में शामिल करने पर जोर दिया गया है। स्कूलों में अलग से ईमानदारी का पाठ पढ़ाने के लिए तरीका खोजने की बात पहली बार अन्ना आंदोलन के प्रभाव में शिक्षा बोर्डों के सामने रखी गई।

जानकारी के अनुसार केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सीबीएसई तथा सीआईएससीई से छठी से नवीं कक्षा के छात्रों के लिए सत्यनिष्ठा क्लब स्थापित करने की सिफारिश की। इस क्लब के माध्यम से बच्चों के मन में भ्रष्टाचार विरोधी धारणा स्थापित की जा सकती है। यह योजना भविष्य में भ्रष्टाचार से लड़ने के उपायों का एक प्रयास होगा।

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कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया?

 शुक्रवार, 1 जून, 2012 को 08:26 IST तक के समाचार
ब्रहमेश्वर मुखिया
मुखिया पिछले वर्ष जेल से रिहा हुए थे. (फोटो प्रेट्र)
ब्रहमेश्वर सिंह उर्फ बरमेसर मुखिया बिहार की जातिगत लड़ाईयों के इतिहास में एक जाना माना नाम है.
भोजपुर ज़िले के खोपिरा गांव के रहने वाले मुखिया ऊंची जाति के ऐेसे व्यक्ति थे जिन्हें बड़े पैमाने पर निजी सेना का गठन करने वाले के रुप में जाना जाता है.
बिहार में नक्सली संगठनों और बडे़ किसानों के बीच खूनी लड़ाई के दौर में एक वक्त वो आया जब बड़े किसानों ने मुखिया के नेतृत्व में अपनी एक सेना बनाई थी.
सितंबर 1994 में बरमेसर मुखिया के नेतृत्व में जो सगंठन बना उसे रणवीर सेना का नाम दिया गया.
उस समय इस संगठन को भूमिहार किसानों की निजी सेना कहा जाता था.
इस सेना की खूनी भिड़ंत अक्सर नक्सली संगठनों से हुआ करती थी.
बाद में खून खराबा इतना बढ़ा कि राज्य सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था.
नब्बे के दशक में रणवीर सेना और नक्सली संगठनों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ की बड़ी कार्रवाईयां भी कीं
सबसे बड़ा लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार एक दिसंबर 1997 को हुआ था जिसमें 58 दलित मारे गए थे.
इस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की जातिगत समस्या को उजागर कर दिया था. इस घटना में भी मुखिया को मुख्य अभियुक्त माना गया था.
ये नरसंहार 37 ऊंची जातियों की हत्या से जुड़ा था जिसे बाड़ा नरसंहार कहा जाता है. बाड़ा में नक्सली संगठनों ने ऊंची जाति के 37 लोगों को मारा था जिसके जवाब में बाथे नरसंहार को अंजाम दिया गया.
इसके अलावा मुखिया बथानी टोला नरसंहार में अभियुक्त थे जिसमें उन्हें गिरफ्तार किया गया 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्सीबिजन रोड से. उन पर पांच लाख का ईनाम था और वो जेल में नौ साल रहे.
बथानी टोला मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस ने कहा कि मुखिया फरार हैं जबकि मुखिया उस समय जेल में थे. इस मामले में मुखिया को फरार घोषित किए जाने के कारण सज़ा नहीं हुई और वो आठ जुलाई 2011 को रिहा हुए.
बाद में बथानी टोला मामले में उन्हें हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी.
277 लोगों की हत्या से संबंधित 22 अलग अलग आपराधिक मामलों (नरसंहार) में इन्हें अभियुक्त माना जाता थ. इनमें से 16 मामलों में उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था. बाकी छह मामलों में ये जमानत पर थे.
जब वो जेल से छूटे तो उन्होंने 5 मई 2012 को अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से संस्था बनाई और कहते थे कि वो किसानों के हित की लड़ाई लड़ते रहेंगे.
जब मुखिया आरा में जेल में बंद थे तो इन्होंने बीबीसी से इंटरव्यू में कहा था कि किसानों पर हो रहे अत्याचार की लगातार अनदेखी हो रही है.
मुखिया का कहना था कि उन्होंने किसानों को बचाने के लिए संगठन बनाया था लेकिन सरकार ने उन्हें निजी सेना चलाने वाला कहकर और उग्रवादी घोषित कर के प्रताड़ित किया है.
उनके अनुसार किसानों को नक्सली संगठनों के हथियारों का सामना करना पड़ रहा था.