संपादक ;
आज कला शिक्षा का मुकाम एक कठिन दौर से गुजर रहा है , जिसमें शिक्षण की गुणवत्ता के मायने अपने अपने अनुसार चुन लिए गए हैं , जिसमें न तो नियम और कायदे की कोई जगह है और न ही गुणवत्ता की अतः अब इस शिक्षा के चलते यह विद्या कौन सा मुकाम लेगी समय बताएगा . इस बिच देखने को मिला है की जिनको हमने पढ़ाया अनाप सनाप पीऍच .डी . करा दी और उन्हें ही उत्पात के लिए छोड़ दिया , आज ये स्थिति है की गुरुजनों को नियम कायदे नहीं आते , न ही वाटर कलर (जल रंग) के न ही ऑयल कलर के .
मूलतः विभिन्न शिक्षा संस्थानों में पढाये जा रहे कला पाठ्यक्रमों में कलात्मकता मात्र खानापूरी होकर रह गयी है यही कारण है की विषय की प्रासंगिकता, उसके सन्दर्भ तथा रचनाधर्मिता को जिस तरह प्रस्फुटित होना चाहिए वह कहीं न कहीं ठहरा या ठहरी हुयी है, दरअसल जिस विषय को किसी न किसी रोज़गार से जोड़कर देखा जाता है उसकी दोहरी व्यथा होती है, न ही उसे नकारा जाता है और न ही स्वीकार ही किया जाता है.परिणामतः उसका पूरा ध्यान न तो रचनाधर्मिता पर होता है और न ही उस विषय की समझ पर ही. एन केन प्रकारेण स्नातकोत्तर स्तर पर (विश्वविद्यालयी आदेशों के घोड़े सरपट दौडाये जा रहे हैं) जिसका न तो कलाकर्म से कोई लेना देना है और न ही पाठ्यक्रम से.यही कारण है की तमाम विद्यार्थी इन विधाओं से रूबरू होने की वजाय उससे घबरा जाते हैं . जिसके अनेक कारण है यथा -
१-जिन परिवारों से ये विद्यार्थी आते हैं उनमें विषय की समझ नहीं होती अतः उन्हें लगता है की ये विषय भी केवल और केवल क्लास रूम की पढ़ाई से काम चल जाता है जबकि इस तरह के विषयों के लिए निरंतर साधना की आवश्यकता होती है जिसे विद्यार्थी को ही करनी होती है .
२.इनकी संस्थाएं सजग नहीं हैं जिनकी वजह से संसाधन ही नहीं हैं जिससे इन विषयों को उन्नत किया जा सके, समय की कमी बहुत ही आड़े आती है.
३.प्रशिक्षित गुरुजनों का संकट (यहाँ यह स्पष्ट कर देना है की तिकड़म और पारंगतता के सिद्धांत पर नियुक्तियों को किया और न किया जाना ही सबसे अधिक विनाशकारी है, जानपहचान, भाई भतीजावाद, जातिवाद और भ्रष्टाचार का असर परंपरागत विषयों में स्पष्ट रूप से नज़र आता है) इनकी भरमार से इस विषय को सर्वाधिक नुकसान उठाना पद रहा है.
४.परंपरा की वजाय अपने मानदंड गढ़ना अथवा 'नक़ल' को बढ़ावा देना.
५.मौलिकता, सिद्धांत, शैली का अज्ञान निरंतर बढ़ता जा रहा है, क्योंकि अधिकाँश स्थानों पर देखने में आया है की पेंटिंग की तय तकनीकी का ही ज्ञान नहीं है, रंगों के उपयोग का ही ज्ञान नहीं है.ब्रश के इस्तेमाल का ज्ञान नहीं है , पेपर के उपयोग का ज्ञान नहीं है.
६.पुरे पाठ्यक्रम के निर्धारण के दरमियान यह देखने को मिला की कोई भी सैद्धांतिक बदलाव स्वीकार्य नहीं हैं, यथा स्थिति बनाये रखना, शिक्षक को पढ़ना न पड़े, प्रक्टिकल में कुछ करना न पड़े ऐसा पाठ्यक्रम हो. सारा दोषारोपण छात्रों पर की ये गन्दी जगहों से आते हैं इन्हें कुछ ज्ञान ही नहीं होता इन्हें यह नहीं आता वह नहीं आता इसलिए पाठ्यक्रम में किसी सुधार की जरूरत नहीं है.
७.विषय विशेषग्य भी क्या करेंगे दो दो धुरंधर विशेष आमंत्रीत जो हैं उपर्युक्त के लठैत, मैंने तो आजतक ऐसे ही चलाया है. यहाँ तो यही चलेगा.
आईये उच्च शिक्षा के उन्नयन को देखें कई कठोर कदम जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढे -
(अ) जाती आधार पर अंकों का वितरण , परीक्षकों की नियुक्तियां , अंकों के नाम पर गुरुता का हथियार.
(बी) भ्रष्ट आचरण का खुला खेल . पढ़ने पढ़ाने की वजाय अनेक तरह के खेल (सब कुछ प्रमाण सहित संकलित यदि देखना चाहें) परीक्षा , क्लर्की .आदि आदि.
(स)ज्यादा समय चमचागिरी में गुजारने से भी बच्चों के समय में कमिं आती है.
१-जिन परिवारों से ये विद्यार्थी आते हैं उनमें विषय की समझ नहीं होती अतः उन्हें लगता है की ये विषय भी केवल और केवल क्लास रूम की पढ़ाई से काम चल जाता है जबकि इस तरह के विषयों के लिए निरंतर साधना की आवश्यकता होती है जिसे विद्यार्थी को ही करनी होती है .
२.इनकी संस्थाएं सजग नहीं हैं जिनकी वजह से संसाधन ही नहीं हैं जिससे इन विषयों को उन्नत किया जा सके, समय की कमी बहुत ही आड़े आती है.
३.प्रशिक्षित गुरुजनों का संकट (यहाँ यह स्पष्ट कर देना है की तिकड़म और पारंगतता के सिद्धांत पर नियुक्तियों को किया और न किया जाना ही सबसे अधिक विनाशकारी है, जानपहचान, भाई भतीजावाद, जातिवाद और भ्रष्टाचार का असर परंपरागत विषयों में स्पष्ट रूप से नज़र आता है) इनकी भरमार से इस विषय को सर्वाधिक नुकसान उठाना पद रहा है.
४.परंपरा की वजाय अपने मानदंड गढ़ना अथवा 'नक़ल' को बढ़ावा देना.
५.मौलिकता, सिद्धांत, शैली का अज्ञान निरंतर बढ़ता जा रहा है, क्योंकि अधिकाँश स्थानों पर देखने में आया है की पेंटिंग की तय तकनीकी का ही ज्ञान नहीं है, रंगों के उपयोग का ही ज्ञान नहीं है.ब्रश के इस्तेमाल का ज्ञान नहीं है , पेपर के उपयोग का ज्ञान नहीं है.
६.पुरे पाठ्यक्रम के निर्धारण के दरमियान यह देखने को मिला की कोई भी सैद्धांतिक बदलाव स्वीकार्य नहीं हैं, यथा स्थिति बनाये रखना, शिक्षक को पढ़ना न पड़े, प्रक्टिकल में कुछ करना न पड़े ऐसा पाठ्यक्रम हो. सारा दोषारोपण छात्रों पर की ये गन्दी जगहों से आते हैं इन्हें कुछ ज्ञान ही नहीं होता इन्हें यह नहीं आता वह नहीं आता इसलिए पाठ्यक्रम में किसी सुधार की जरूरत नहीं है.
७.विषय विशेषग्य भी क्या करेंगे दो दो धुरंधर विशेष आमंत्रीत जो हैं उपर्युक्त के लठैत, मैंने तो आजतक ऐसे ही चलाया है. यहाँ तो यही चलेगा.
आईये उच्च शिक्षा के उन्नयन को देखें कई कठोर कदम जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढे -
(अ) जाती आधार पर अंकों का वितरण , परीक्षकों की नियुक्तियां , अंकों के नाम पर गुरुता का हथियार.
(बी) भ्रष्ट आचरण का खुला खेल . पढ़ने पढ़ाने की वजाय अनेक तरह के खेल (सब कुछ प्रमाण सहित संकलित यदि देखना चाहें) परीक्षा , क्लर्की .आदि आदि.
(स)ज्यादा समय चमचागिरी में गुजारने से भी बच्चों के समय में कमिं आती है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समानता के तहत जिस तरह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विभिन्न पाठ्यक्रमों को एकरूपता देने के लिए निर्देशित किया है वहीँ जमीनी हकीकतें और तरह की हैं जिनमें न तो संसाधन ही हैं और न ही मानसिकता न ही नैतिक प्रतिबद्धता. यही कारन है कि समुचित विस्तार की वजाय अनुचित विस्तार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे निकम्मेपन की प्रचुरता भी हो रही है नियंत्रण के सारे मानदंड असफल हो रहे है.
उपस्थिति का लेखा जोखा और शिक्षकों की कमीं सारा सिस्टम ख़राब करके रख दे रही है. जिन विषयों में प्रयोगात्मक कक्षाएं होनी हैं उनका समय और सामान्य विषयों के विद्यार्थियों का समय दोनों में बहुत ही अंतर है.
जहाँ हम पाठ्यक्रम की गुणवत्ता की बात करते हैं वहीं हम किसी न्किसी तरह से उस गुणवत्ता को बनाये रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं ऐसे में किन किन कारणों से ऐसा हो रहा है विचार करना आवश्यक है.
सेमेस्टर के समुचित संचालन हेतु आवासीय संस्थानों की स्थिति ही उचित प्रतीत होती है यह कम से कम लैब अथवा स्टूडियो के कार्यों के लिए तो अति आवश्यक है, अन्यथा 40-50 किलोमीटर की दूरी तय करके कोई विद्यार्थी इस तरह के कोर्सेस को इमानदारी से पूरा नहीं कर सकता,यदि उसके लिए ऐसी व्यवस्था कर दी जाये तो ऐसी कला साधना संभव हो सकती है .
अन्यथा इस तरह के काम इनके लिए भी मुस्किल नहीं ;
(उदहारण)
यदि उपर्युक्त कमियों को दूर कर दिया जाए तो इस तरह के कामों को निर्मित कराया जा सकता है . यदि इसमें सुधार न हो सकता है और न ही सांस्कृतिक कला चेतना ही परिवर्तित हो सकती है .
अन्यथा इस तरह के काम इनके लिए भी मुस्किल नहीं ;
(उदहारण)
यदि उपर्युक्त कमियों को दूर कर दिया जाए तो इस तरह के कामों को निर्मित कराया जा सकता है . यदि इसमें सुधार न हो सकता है और न ही सांस्कृतिक कला चेतना ही परिवर्तित हो सकती है .












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