बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

मोनालिसा भारतीय होती तो?

( बी बी सी से साभार )

अगर मोनालिसा भारतीय होती तो?

 बुधवार, 17 अक्तूबर, 2012 को 18:47 IST तक के समाचार
मोनालिसा
मोनालिसा को मिला बनी-ठनी का रुप.
पश्चिम में रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति मोनालिसा पिछले पांच साल से राजस्थान में सौंदर्य की नायिका 'बनी-ठनी' के लिबास में कला प्रदर्शनियों की शोभा बनी हुई है.
राजस्थान के एक चित्रकार ने मोनालिसा को 'बनी-ठनी' के रूप में चित्रित किया है लेकिन कोई इसमें पूर्व और पश्चिम के मिलन की झांकी देखता है तो कुछ चित्रकार इसे ठीक नहीं मानते.
'बनी ठनी ' औरत की ऐसी चित्रकृति है जिसमे लोग सैंकड़ो सालों से राजस्थान के रूपसी वैभव को निहारते रहे है. अब उसने यूरोप के मोनालिसा का बाना पहन लिया है.
राजस्थान के शाही दौर में राजसी मोहब्बत के कई अफसाने सहारा की रेत पर इबारत बन कर उभरे, लेकिन बनी-ठनी वो प्रेम गाथा है जिसमे एक राजा ने अपने चहेते चित्रकार से सपनों की महबूबा को केनवास पर उतरवाया.

बनी-ठनी

"'' सौंदर्य के दो नजरिए हैं, एक यूरोप का और दूसरा राजस्थान का.सुंदरता तो सुंदरता है.मैंने इन दोनों का समागम किया है"
गोपाल खेतांची
किशनगढ़ रियासत के एक चित्रकार ने जब राजा की अनाम प्रेयसी को तस्वीर में उभारा तो उस बेपनाह खूबसूरती को हर देखने वाले ने बनी-ठनी का नाम दिया. ये किशनगढ़ के तत्कालीन राजा सावंत सिंह के दौर की बात है जब सौंदर्यकी गाथाओ में बनी-ठनी नायिका बन उभरी.
बनी-ठनी पहले राजा सावंत सिंह के ख्वाबों में आई, फिर केनवास पर उतरी. चित्रकार गोपाल खेतांची ने मोनालिसा को उसी-बनी ठनी चित्रों के जरिए रूपांतरित किया है.
वे अपने इस प्रयोग के बारे में कहते है, ''सौंदर्य के दो नजरिए हैं, एक यूरोप का और दूसरा राजस्थान का. सुंदरता तो सुंदरता है. मैंने इन दोनों का समागम किया है.इस प्रयोग को पेरिस और लंदन की कला जगत में बड़ी सराहना मिली है. वैसे तो सौंदर्य देखने वाले की आंखों में होता है. वहां के सौंदर्य में एक मांसलता है, थोड़ी मादकता है. अपने यहां सौंदर्य में नजाकत है, नफासत है.बनी-ठनी तो भारत के रूप का प्रतीक है.''
बनी-ठनी राजस्थान के रूप लावण्य का प्रतिबिंब बन गई है.उसमें नायिका की बादाम जैसी आँखे, धनुष सरीखी भौंए ,उभरी ठोड़ी ,लंबी अंगुलियां और गुलाबी अदा है.इसमें औरत का रूप सौंदर्य से भरपूर है.मगर उस खूबसूरती में इतनी गरिमा है कि वो किसी फैशन शो का हिस्सा नहीं लगती.

चित्रकृति

जाने माने शिल्पी और पद्मश्री से सम्मानित अर्जुन प्रजापति कहते है, ''बनी-ठनी एक ऐतिहासिक चित्रकृति है.दुनिया भर में इसका नाम है. उसमे नायिका के तीखे नाक नक्श है.जब ये पेंटिंग बनी, उस वक्त कैमरे नहीं थे. राजा बताते गए और उनका चित्रकार केनवास पर पेंटिंग बनाता गया. राजा बोलते गए कि उसका नाक तीखा और लंबा था.आंखे मछली की तरह थी, होंठ कमल की पतियों के आकार की , वो विवरण बताते गए और कृति बनती चली गई. किशनगढ़ की ये बनी ठनी पूरे विश्व में मशहूर हो गई. मेरे हिसाब से बहुत चर्चित पेंटिंग पर प्रयोग नहीं करना चाहिए.''
वे कहते है ऐसी चर्चित अनूठी कृति से छेडछाड़ ठीक नहीं है. खुद प्रजापति ने भी बनी-ठनी की एक चित्रकृति अपने हाथो से बनाई है, जो काफी चर्चित रही है.
प्रजापति कहते हैं, ''बनी-ठनी का मतलब है सुंदर रूप, वो महिला जो गहनों से सजी हो और अच्छा परिधान हो उसे कहते है बनी-ठनी.''

प्रेम और भक्ति

बनी-ठनी में राधा कृष्ण है तो प्रेम और भक्ति भी है.अब उसने मोनालिसा का बाना भी पहन लिया है.
कला समीक्षक ईश्वर माथुर बनी-ठनी का रूप वर्णन करते है और कहते है, ''मछली जैसी आंख, नाक और ठोडी. ये तीन उसके रूप की खास बाते हैं.उसका चटख रंग सबको आकर्षित करता है. अगर किसी ने इन खूबियों को समाहित किया है तो ठीक है क्योंकि किशनगढ़ के राजा को उस समय नागरीदास कहा जाता था. अगर वो बनी-ठनी नागरीदास की कल्पना के मुताबिक है तो इसे बनी-ठनी कहा जा सकता है.''
मोनालिसा
मोनालिसा के दुनियाभर में दीवाने हैं
माथुर कहते है बनी-ठनी और मोनालिसा का अपना अपना स्थान है. दोनों की तुलना नही की जा सकती. हां कलाकर का हर सृजन खूबसूरत होता है. लेकिन सौंदर्य के इन दोनों प्रतिमानों की तुलना करना ठीक नहीं है.
किशनगढ़ की चित्र शैली मुगल बादशाहत के दौर में पर्शिया के फराज से लाए गए चित्रकारों की कला का ही विस्तार माना जाता है.

इतिहास

मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने फराज से चित्रकारों को बुलाया और प्रोत्साहित किया. बाद में ये रियासतों में पहुंची और नया रंग रूप अख्तियार किया.
"बनी-ठनी का मतलब है सुंदर रूप, वो महिला जो गहनों से सजी हो और अच्छा परिधान हो उसे कहते है बनी ठनी"
प्रजापति
चित्रकार एकेश्वर हटवाल मोनालिसा के राजस्थानी अवतरण पर कहते है, ''कलाकार ने अपनी पेंटिंग में मोनालिसा को राजस्थानी परिधान में संवारा है. गहने भी राजस्थानी है, शैली भी वही. बाकि उसकी मुस्कान मोनालिसा जैसी है. चित्र में उसका रूप वैभव वैसा ही है. मगर कलाकार ने उसे बनी-ठनी से जोड़ कर अपनी भावना को प्रदर्शित किया है.जैसे मोनालिसा महान कृति है.''
वे कहते हैं कि वैसे ही बनी-ठनी भी अनूठी है. इन दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए. ऐसे प्रयोग हर विधा में हो रहे है. ये संगीत में भी हो रहा है. इसे फुजंन कहते है. ये दो संस्कृतियो के मिलन का प्रयोग है. इसमें आनंद की सृष्टि होती है. ऐसे प्रयोग ठीक है और नई पीढ़ी इसे बहुत पसंद करती है.
सदियों पहले चित्रकार की कूंची ने औरत को केनवास पर उतारा तो न फैशन के मेले थे, ना कैटवाक. वो हाथ के हुनर का दौर था. अब कैमरे है, लेकिन केनवास पर वैसा सौंदर्य नहीं दिखता जो मोनालिसा के मुस्कान और बनी-ठनी का रूप लावण्य में है.

रविवार, 30 सितंबर 2012

WWW.BBCHINDI.COM
से साभार यह लेख आमजन के लिए भी उपयोगी है। यद्यपि आमजन में यह विश्वास आज भी कायम है पर जिसे हम सभी समाज कहते हैं वह  बुरी तरह से इन दुर्गुणों में लिप्त है, उसे पाप पुन्य से कोई लेना देना नहीं क्योंकि वह  सदियों से इनके मतलब अच्छी तरह से जानता है पर इनसे वह  कैसे लाभन्वित होता है यही गुण उसमें दर्शनीय होता है-

दुनिया के सात महापाप क्या हैं?

 गुरुवार, 27 सितंबर, 2012 को 13:47 IST तक के समाचार
पेटूपन न सिर्फ़ बुराईयों की जड़ है यह आपका स्वास्थ भी ख़राब करता है
अकसर आप लोगों ने दुनिया के सात आश्चर्य यानी seven wonders के बारे में सुना पढ़ा, और देखा होगा. इन अजूबों में अब भारत का ताजमहल भी शामिल है, लेकिन क्या आप सात महापाप के बारे में भी जानते हैं?
हम लेकर आए हैं दुनिया के सात महापाप. क्या होते हैं ये सात महापाप? अंग्रेज़ी भाषा और पश्चिमी साहित्य एवं संस्कृति में इसे किस प्रकार देखा जाता है?
अंग्रेज़ी में इन्हें सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) भी कहा जाता है.
जब से मनुष्य ने होश संभाला है तभी से उनमें पाप-पुण्य, भलाई-बुराई, नैतिक-अनैतिक जैसे आध्यात्मिक विचार मौजूद हैं. सारे धर्म और हर क्षेत्र में इसका प्रचलन किसी न किसी रूप में ज़रूर है.
यह सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) इस प्रकार हैं:
लस्ट (Lust)
ग्लूटनी (Gluttony)
ग्रीड (Greed)
स्लौथ (Sloth)
रैथ (Wrath)
एनवी (Envy)
प्राइड (Pride)

ये सारे शब्द भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) के रूप हैं. लेकिन इनमें से कई का प्रयोग क्रिया और विशेषण के रूप में भी होता है. अगर इन्हें ग़ौर से देखें तो पता चलता है कि इन सारे महापाप की हर जगह भरमार है.
पुराने ज़माने में इन सब को बड़े पाप में शामिल किया जाता था और उनसे बचने की शिक्षा दी जाती थी. पुराने ज़माने में ईसाई धर्म में इन सबको घोर पाप की सूची में रखा गया था क्योंकि इनकी वजह से मनुष्य सदा के लिए दोषी ठहरा दिया जाता था और फिर बिना कंफ़ेशन के मुक्ति का कोई चारा नहीं था.
सेक्स शॉप
कामवासना या कामुकता को सात महापापों में से एक माना जाता है.
लस्ट (Lust) यानी लालसा, कामुकता, कामवासना (Intense or unrestrained sexual craving)- ये मनुष्य को दंडनीय अपराध की ओर ले जाते हैं और इनसे समाज में कई प्रकार की बुराईयां फैलती हैं. विशेषण में इसे लस्टफुल (lustful) कहते हैं
ग्लूटनी (Gluttony) यानी पेटूपन. इसे भी सात महापापों में रखा गया है. जी हां दुनिया भर में तेज़ी से फैलने वाले मोटापे को देखें तो यह सही लगता है कि पेटूपन बुरी चीज़ हैं और हर ज़माने में पेटूपन की निंदा हुई है और इसका मज़ाक़ उड़ाया गया है. ठूंस कर खाने को महापाप में इस लिए रखा गया है कि एक तो इसमें अधिक खाने की लालसा है और दूसरे यह ज़रूरतमंदों के खाने में हस्तक्षेप का कारण है.
मध्यकाल में लोगों ने इसे विस्तार से देखा और इसके लक्षण में छह बातें बताईं जिनसे पेटूपन साबित होता है. वह इस प्रकार हैं.
eating too soon--------------eating too eagerly
eating too expensively----- eating too daintily
eating too much-------------eating too fervently
ग्रीड (Greed) यानी लालच, लोभ. यह भी लस्ट और ग्लूटनी की तरह है और इसमें अत्यधिक प्रलोभन होता है. चर्च ने इसे सात महापाप की सूची में अलग से इस लिए रखा है कि इसमें धन-दौलत का लालच शामिल है (An excessive desire to acquire or possess more than what one needs or deserves, especially with respect to material wealth)
स्लौथ (Sloth) यानी आलस्य, सुस्ती और काहिली (Aversion to work or exertion; laziness; indolence). पहले स्लौथ का अर्थ होता था उदास रहना, ख़ुशी न मनाना.
इसे महापाप में इसलिए रखा गया था कि इसका मतलब था ख़ुदा की दी हुई चीज़ से परहेज़ करना. इस अर्थ का पर्याय आज melancholy, apathy, depression, और joylessness होगा. बाद में इसे इसलिए पाप में शामिल रखा गया क्योंकि इसकी वजह से आदमी अपनी योग्यता और क्षमता का प्रयोग नहीं करता है.
रैथ (Wrath) ग़ुस्सा, क्रोध, आक्रोश. इसे नफ़रत और ग़ुस्से का मिला जुला रूप कहा जा सकता है जिसमें आकर कोई कुछ भी कर जाता है. ये सात महापाप में अकेला ऐसा पाप है जिसमें आपका अपना स्वार्थ शामिल न हो (Forceful, often vindictive anger)
एनवी (Envy) यानी ईर्ष्या, डाह, जलन, हसद. यह ग्रीड यानी लालच से इस अर्थ में अलग है कि ग्रीड में धन-दौलत ही शामिल है जबकि यह उसका व्यापक रूप है. यह महापाप इसलिए है कि कोई गुण किसी में देख कर उसे अपने में चाहना और दूसरे की अच्छी चीज़ को सहन न कर पाना.
प्राइड (Pride) यानी घमंड, अहंकार, अभिमान को सातों माहापाप में सबसे बुरा पाप समझा जाता है. किसी भी धर्म में इसकी कठोर निंदा और भर्त्सना की गई है. इसे सारे पाप की जड़ समझा जाता है क्योंकि सारे पाप इसी के पेट से निकलते हैं. इसमें ख़ुद को सबसे महान समझना और ख़ुद से अत्यधिक प्रेम शामिल है.
अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफ़र मारलो ने अपने नाटक डॉ. फ़ॉस्टस में इन सारे पापों का व्यक्तियों के रूप में चित्रण किया है. उनके नाटक में यह सारे महापाप इस क्रम pride, greed, envy, wrath, gluttony, sloth, lust में आते हैं.
अब जबकि आपने सात अजूबों के साथ सात महापाप भी देख लिए हैं तो ज़रा सात महापुण्य भी देख लें. यह इस प्रकार हैं.
लस्ट (Lust)--------- Chastity पाकीज़गी, विशुद्धता,
ग्लूटनी (Gluttony)-- Temperance आत्म संयम, परहेज़,
ग्रीड (Greed)-------- Charity यानी दान, उदारता,
स्लौथ (Sloth)--------Diligence यानी परिश्रमी,
रैथ (Wrath)--------- Forgiveness यानी क्षमा, माफ़ी
एनवी (Envy)---------Kindness यानी रहम, दया,
प्राइड (Pride)-------- Humility विनम्रता, दीनता, विनय
तो फिर क्या सोच रहे हैं. चलिए इन महापापों से बचने और सदगुणों को अपनाना की प्रक्रिया शुरु कर दीजीए.

शनिवार, 22 सितंबर 2012

ईरानी युवतियां नहीं पढ़ेंगी इंजीनीयरिंग, साहित्य ..


ईरानी युवतियां नहीं पढ़ेंगी इंजीनीयरिंग, साहित्य ..

 रविवार, 23 सितंबर, 2012 को 01:02 IST तक के समाचार
ईरान महिला
ईरान में महिलाओं को क्षेत्र के दूसरे मुल्कों के मुक़ाबले काफ़ी आज़ादी हासिल है.
ईरान में 30 विश्वविद्यालयों ने 80 अलग-अलग विषयों के डिग्री पाठ्यक्रमों में महिलाओं के दाख़िले पर रोक लगा दी है.
जिन पाठ्यक्रमों में औरतों के दाख़िले पर प्रतिबंध लगाए गए हैं उनमें इंजीनियरिंग, नाभिकीय भौतिकी (न्यूक्लियर फ़िज़िक्स), कंप्यूटर साइंस, अंग्रेज़ी साहित्य और पुरातत्व शामिल हैं.
हालांकि सरकार ने नए नियमों पर कोई सफ़ाई नहीं दी है लेकिन नॉबेल पुरूस्कार विजेता शिरीन इबादी जैसे लोगों कहना है कि ये फ़ैसला हुकूमत की उन नीतियों का हिस्सा है जिसके तहत महिलाओं को शिक्षा से दूर रखने की कोशिश की जा रही है.
शिरीन इबादी ने बीबीसी से कहा, "ईरानी प्रशासन शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की पहुंच को सीमित करने, समाज में उन्हें कम सक्रिय रखने और उन्हें घर की चाहरदीवारी तक सीमित करने के लिए बहुत सारे क़दम उठा रहा है."
"ईरानी प्रशासन शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की पहुंच को सीमित करने, समाज में उन्हें कम सक्रिय रखने और उन्हें घर की चाहरदीवारी तक सीमित करने के लिए बहुत सारे क़दम उठा रहा है."
शिरीन इबादी, नोबेल पुरस्कार विजेता
ईरान के उच्च शिक्षा मंत्री कामरान दानिशजू का कहना है कि नए नियमों को बहुत महत्व नहीं दिया जाना चाहिए. उनका कहना है कि ईरान ने उच्च शिक्षा में युवाओं की शिरकत को हमेशा प्रोत्साहित किया है और नए नियमों के बावजूद विश्वविद्यालयों के नब्बे फ़ीसद कोर्सेस महिलाओं और पुरूष दोनों के लिए खुले हैं.

प्रोत्साहन

ईरान वो मुल्क है जिसने मध्य-पूर्व में सबसे पहले औरतों को विश्वविद्यालयों में शिक्षा हासिल करने की इजाज़त दी थी और 1979 के इस्लामी क्रांति के बाद से युवतियों को उच्च शिक्षा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है.
साल 2001 तक शिक्षा में औरतों की तादाद मर्दों से ज़्यादा हो चुकी थी. फ़िलहाल पूरे शिक्षा क्षेत्र में महिलाओं की संख्या लगभग 60 प्रतिशत के आसपास है यानी संख्या के आधार पर वो पुरूषों से अधिक हैं.
ईरान आज़ादी
साल 2009 के प्रदर्शनों में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.
विश्वविद्यालयों में महिलाओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. लोगों का कहना है कि इसके पीछे उनकी ज़िंदगी अपनी तरह से जीने और अधिक आज़ादी की चाहत है जो आर्थिक स्वतंत्रता की वजह से हासिल होगी.
लेकिन साल 2009 में हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद मुल्क में रूढ़िवादी नेताओं की पकड़ मज़बूत हुई है. देश के प्रमुख नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने विश्वविद्यालयों के 'इस्लामीकरण' की मांग की है और कई ऐसे विषयों की कड़ी निंदा की है जिनमें उनके मुताबिक़ पश्चिम की बहुत ज़्यादा छाप है.

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

शादीशुदा थे ईसा मसीह?


क्या शादीशुदा थे ईसा मसीह?

 गुरुवार, 20 सितंबर, 2012 को 11:33 IST तक के समाचार
चौथी शताब्दी के इस दस्तावेज में ईसा मसीह की पत्नी का जिक्र होने का दावा किया गया है
ईसाई इतिहास के एक जानकार के मुताबिक एक प्राचीन भोजपत्र पर ईसा मसीह शादी-शुदा का स्पष्ट विवरण है.
रोम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हार्वर्ड विश्ववद्यालय की प्रोफेसर केरेन किंग ने चौथी शताब्दी के भोजपत्र में लिखे इस अभिलेख का ज़िक्र किया. ये भोजपत्र कूड़े के एक ढेर में मिला था.
उन्होंने बताया कि शोधकर्ताओं ने इन शब्दों को पहचान लिया है जिसमें ईसा मसीह अपनी पत्नी का ज़िक्र करते हैं. किंग के मुताबिक हो सकता है कि ये मेरी मैग्डेलन हों.
ईसाई मान्यताओं के मुताबिक ईसा मसीह अविवाहित थे, लेकिन केरेन किंग का कहना है कि बहुत पहले ये बहस का मुद्दा था.
उनका कहना था कि इस शोध से ईसा मसीह के ब्रह्मचर्य और ईसाइयत में महिलाओं की भूमिका को लेकर एक नई बहस छिड़ सकती है.
"भोजपत्र पर लिखी चीज किसी बात का सबूत नहीं हो सकती. ये बिना किसी संदर्भ के हवा में दिया गया एक बयान जैसा है"
जिम वेस्ट, प्रोफेसर
लेकिन इस घोषणा ने धर्मशास्त्र के कई जानकारों को भड़का भी दिया है.
तेनेसी में एक प्रोफेसर और पादरी जिम वेस्ट कहते हैं, “भोजपत्र पर लिखी चीज किसी बात का सबूत नहीं हो सकती. ये बिना किसी संदर्भ के हवा में दिया गया एक बयान जैसा है.”

आशंका

जाने-माने भाषा वैज्ञानिक वोल्फ-पीटर भी इस सम्मेलन में मौजूद थे. उनका कहना था, “कूड़े के ढेरों में हजारों भोजपत्र पड़े हैं जिनमें बेतुकी बातें लिखी होंगी.”
सम्मेलन में कई ऐसे सवाल उठाए गए जिनका जवाब नहीं दिया जा सका.
लेकिन केरेन किंग का कहना था कि ये भोजपत्र ऐसा पहला धर्मलेख है जिसमें ईसा मसीह अपनी पत्नी को संबोधित कर रहे हैं.
उनके मुताबिक चौथी शताब्दी का ये दस्तावेज संभवत: मूल रूप से दूसरी शताब्दी में ग्रीक भाषा में लिखा गया था.
केरेन का कहना था कि शुरुआत में उन्हें लगा कि ये नकली है, लेकिन पूरी तरह से परीक्षण के बाद पता चला कि ये वास्तविक है.
उनका कहना था, “कई विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं लेकिन इस पर अंतिम निर्णय अभी और कई दौर के परीक्षणों के बाद ही लिया.
ईसा मसीह
ईसाई धर्म की मान्यता है कि ईसा मसीह ब्रह्मचर्य का पालन किया करते थे
केरेन का कहना था कि ये दस्तावेज ईसा मसीह की वैवाहिक स्थिति का प्रमाण नहीं था.
वहीं केंटकी में प्रोफेसर और बाइबिल के विद्वान बेन विदरिंगटन कहते हैं कि हो सकता है कि ‘वाइफ’ शब्द का इस्तेमाल किसी घरेलू नौकरानी या किसी अनुयायी के लिए किया गया हो.
केरेन के सहयोगी शोधकर्ताओं का कहना है कि इस दस्तावेज में ईसा मसीह अपने अनुयायियों से ये भी कहते हैं कि मेरी मैगेडेलेन को शिष्या बनाना फायदेमंद होगा.
इससे ये पुरानी धारणा भी खारिज होती है कि ईसा मसीह की कोई महिला शिष्य नहीं थी.
केरेन ने इन दस्तावेजों को रोम के ला सैपिएंजा विश्वविद्यालय में हुए छह दिवसीय सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत किए थे.
मुरझाए हुए इस भोजपत्र का आकार बहुत छोटा है और इसमें काली स्याही से लिखी हुई आठ पंक्तियां हैं, जिन्हें लेंस की मदद से देखा जा सका.
केरेन ने बताया कि इन टुकड़ों को इकट्ठा करने वाले व्यक्ति ने उसका नाम सार्वजनिक न करने की अपील की है.

सोमवार, 27 अगस्त 2012

प्रदर्शनी

प्रदर्शनी

वार्षिक प्रदर्शनी एम्.ए .चतुर्थ सेमेस्टर 2012 के छात्रों की दिनांक.22 से 25 अगस्त 2012 तक नए

जिम्नेजियम हॉल में आयोजित हुयी जिसका उद्घाटन किया श्री जीतेन हजारिका ने . जिसमें इन छात्रों ने 


अपने चित्र लगाये ;


सपना वर्मा
क्षमा चौधरी
नीतू नगर
अनामिका तिवारी
विनय कुमार
संतोष
प्रियंका गौतम
मनीष कुमार
यास्मिन
एकता रानी
रेनू
विपिन कुमार
रेखा रानी
ऋतु कुमारी
एकता शर्मा
विधि सागर
सुप्रिया
इस तरह कुल 17 विद्यार्थियों ने इस चित्र प्रदर्शनी के अनेक चित्रों के साथ हिस्सेदारी की .
















बुधवार, 15 अगस्त 2012

'जाति या योग्यता'


सीईओ, एमडी बनना है तो अपनी जाति टटोलिए

 बुधवार, 15 अगस्त, 2012 को 07:20 IST तक के समाचार
शोध के मुताबिक भारतीय कॉरपोरेट बोर्डरूम अब भी योग्यता या अनुभव से ज़्यादा जाति के आधार पर काम करता है.
क्या भारतीय कॉरपोरेट बोर्डरूम में जाति के लिहाज़ से विविधता की कमी है?
इस बारे में नई शोध से कई दिलचस्प संकेत मिलते हैं.
कनाडा की नॉर्थन ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के डी अजित, हान डोंकर और रवि सक्सेना ने 1,000 निजी और सरकारी शीर्ष भारतीय कंपनियों के बोर्ड सदस्यों का अध्ययन किया है.
वर्ष 2010 में मुंबई शेयर बाज़ार और नेशनल स्टॉक एक्सचैंज में सूचीबद्ध कुल कंपनियों की पूंजी का 80 प्रतिशत हिस्सा इन 1000 कंपनियों का था.

किसका बोलबाला?

भारत में आमतौर पर किसी व्यक्ति के कुलनाम या सरनेम से उसकी जाति या वर्ण का पता चल जाता है.
"
ये नतीजे दिखाते हैं कि भारतीय कॉरपोरेट जगत एक छोटी और सीमित दुनिया है. कॉरपोरेट जगत में सामाजिक संबंधों या नेटवर्किंग का बहुत महत्व है. भारतीय कॉरपोरेट बोर्डरूम अब भी योग्यता या अनुभव से ज़्यादा जाति के आधार पर काम करता है"
शोधकर्ता
शोधकर्ताओं ने बोर्ड सदस्यों के कुलनाम के आधार पर शोधकर्ताओं ने उन्हें अगड़ी जाति, अन्य पिछड़ी जाति, ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति और विदेशी निदेशकों में बांटा.
इन सभी कंपनियों में औसतन नौ बोर्ड सदस्य थे जिनमें से 88 प्रतिशत "अंदर वाला व्यक्ति या इंसाइडर" थे और 12 प्रतिशत स्वतंत्र निदेशक थे.
भारत में कारोबार चलाने वाले पुरुष और महिलाओं को जाति के आधार पर बांटने से कई दिलचस्प तथ्य सामने आए जो कि पूरी तरह अनेपक्षित नहीं थे.
अध्ययन में पाया गया कि 93 प्रतिशत बोर्ड सदस्य अगड़ी जातियों से थे जबकि अन्य पिछड़ी जातियों से सिर्फ़ 3.8 प्रतिशत निदेशक ही थे.
साठ के दशक से आरक्षण नीति होने के बावजूद अनुसूचित जाति और जनजाति के निदेशक इस कड़ी में सबसे नीचे, 3.5 प्रतिशत ही थे.
शोधकर्ताओं के मुताबिक, "ये नतीजे दिखाते हैं कि भारतीय कॉरपोरेट जगत एक छोटी और सीमित दुनिया है. कॉरपोरेट जगत में सामाजिक संबंधों या नेटवर्किंग का बहुत महत्व है. भारतीय कॉरपोरेट बोर्डरूम अब भी योग्यता या अनुभव से ज़्यादा जाति के आधार पर काम करता है."
शोधकर्ताओं को इस बात पर यक़ीन करने में मुश्किल होती है कि ओबीसी या अनुसूचित जाति और जनजातियों के सीमित प्रतिनिधित्व की वजह सिर्फ़ योग्यता की कमी हो सकती है.

'जाति या योग्यता'

विश्लेषकों का मानना है कि स्कूली स्तर पर बेहतर शिक्षा देने से ही निचली जातियों का उत्थान हो सकता है
हमने लेखक और अनुभवी बिज़नेस सलाहकार गुरचरण दास को इन नतीजों के बारे में बताया.
उनका कहना था कि भारतीय कंपनियों के बोर्डरूम में ज़्यादा विविधता की ज़रूरत है.
लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वहां छोटी जातियों को बाहर रखने के लिए कोई "षडयंत्र" नहीं हो रहा था.
उनका कहना था, "मुझे एक भी ऐसा मामला याद नहीं आता जहां किसी बोर्ड की सदस्यता के लिए सिफ़ारिश करते समय उम्मीदवार की जाति की बात उठी हो. केवल योग्यता को ही महत्व दिया जाता है."
जाति व्यवस्था की वक़ालत करने वाले लोग मानते हैं कि जाति और पारिवारिक संबंधों में विश्वास बढ़ता है जो किसी भी सफल कारोबार की आधारशिला होता है.
आज भी भारतीय समाज की नींव जाति और पारिवारिक निष्ठा पर आधारित है तो फिर व्यापार में ऐसा होने में हैरानी नहीं होनी चाहिए.
लेकिन आलोचकों के मुताबिक जाति व्यवस्था को बढ़ावा देने से भारत पिछड़ रहा है. साथ ही निजी कारोबार, लोगों की भर्ती में आरक्षण का कड़ा विरोध करते हैं क्योंकि वो मानते हैं कि आरक्षण से योग्यता पर असर पड़ता है.

'नतीजों में बराबरी'

गुरचरण दास मानते हैं कि समय के साथ बदलाव आएगा. वो कहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुए अभी सिर्फ़ 21 साल हुए हैं और इसलिए बोर्डरूम में सभी जातियों के सदस्यों का बराबर प्रतिनिधित्व होना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी.
गुरचरण दास और उनकी तरह की सोच रखने वाले लोगों का मानना है कि भारत में निजी शिक्षा संस्थानों में आरक्षण को बढ़ावा देना चाहिए और "नतीजों में बराबरी की जगह अवसरों में बराबरी की कोशिश होनी चाहिए."
गुरचरण दास की दलील की एक वजह है. अध्ययन दिखाते हैं विभिन्न नस्लों और संस्कृतियों से समाज और अर्थव्यवस्थाएं समृद्ध होती हैं.
कहना मुश्किल है कि भारतीय कॉरपोरेट जगत में जातियों के इस असमान प्रतिनिधित्व से हमारी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ रहा है.

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

एक रिपोर्ताज आप भी पढ़िए -


Photo: मै अपने गाँव के चौराहे पर बैठा हूँ ,गांवों में चौराहों का चलन सरकारी 'विकास ' की देन है .कल तक यहाँ पग्दंदियाँ थी ,धुल भरी ,कीचड से  भरी ,बचपन में हम इस डगर से मदरसा जाते थे ,बस्ता लेकर .आज यहाँ सड़क है गद्धेवाली . नवल उपाधिया किसी गड्ढे में गिर गए हैं सुथना भीग गया है प्लास्टिक के जूते में कीचड भर गया है साईकिल  चिमटा टूट गया है ..साईकिल कंधे पर लादे सड़क को गरिआते चले आ रहें हैं .उमर दरजी जनम का मुरहा है ,बर् बखत कुबोल बोलता है -'नवल भैया ! मछली के शिकार पे ..  ' नवल का गुस्सा और बढ़ गया ' तेरी मा ...की ...इन्हां ... फटी पडी है .. औ  मल्हार गा रहें हो ..इ सड़क एकरी मा की ...कयूम टुकड़ा लगाया ,'सड़क की मा ?' इ कैसी है .. ? नवल एक साथ सबको गरियाते हुए उधर बढ़ गए जहां साईकिल की  मरम्मत होती है .सड़क पर चिखुरी चालू हो गए - सरकार ने सड़क दिया ,खलिहान का माल मंडी जाए .मामला उलट गया ...शहर का कचड़ा गाँ में आगिरा .चिप्स ,कुरमुरे ,मह्कौअवा साबुन  ... कहाँ तक गिनाई ? बिजली आयी छोटा मोटा रोजगार लगता लेकिन बची खुची इज्जत भी गिरवी रख दी गयी ,रानी मुखर्जी कुरमुरे खायेगी ,ऐशौर्या राय अपनी खूबसूरती का राज साबुन को बताएगी . त गाँव क लछमिनिया उहै साबुन खरीदी .... जा रे ज़माना ...'  बिकास पर बहस जारी है मै आसरे की चाय की दूकान पर बैठा चिखुरी को निहार रहा हूँ

चंचल जी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं, कला के मर्मज्ञ हैं लिखते तो कमाल के हैं -
एक रिपोर्ताज आप भी पढ़िए -
(उनके फेसबुक से साभार)