मंगलवार, 23 अगस्त 2011

दूसरों को नहीं, खुद को बदलो

(दैनिक जागरण से साभार)

दूसरों को नहीं, खुद को बदलो

Aug 23, 08:29 pm
दूसरों को बदलने के बजाय हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए। सकारात्मक सोच परिस्थितियों में नहीं, दृष्टिकोण में बदलाव लाती है, जिससे स्थितिया सहज हो जाती हैं। ब्रह्मकुमारी शिवानी का चिंतन..
परिवर्तन संसार का नियम है। चाहे वह प्रकृति हो, मनुष्य हो या समय, परिवर्तन तो होना ही है। कई बार हम अलग-अलग परिस्थितियों में खुद को बदलते रहते हैं। लेकिन इस बदलाव के परिणाम भी अलग-अलग हो सकते हैं। कई बार यही बदलाव खुशी और उत्साह लाता है, तो कई बार उदासी और अशांति में डुबो देता है। परंतु यदि सामान्य तौर पर देखा जाए, तो बदलाव एक अवश्यंभावी प्रक्रिया है। इसका अच्छा परिणाम तभी आता है, जब हम उसे केवल बाहरी तौर पर नहीं, बल्कि आंतरिक तौर पर करें।
यह आंतरिक परिवर्तन सकारात्मक होना चाहिए। जैसे कि आप अपने कार्यक्षेत्र में हैं। ऑफिस में अचानक कुछ ऐसा हो जाए, जिससे आपका खासा नुकसान हो रहा हो। मान लीजिए कम्प्यूटर क्रैश हो गया, जिसमें आपका बहुत सारा उपयोगी डेटा था। ऐसे में आप अपना होश खो बैठते हैं। आपमें आया इस तरह का परिवर्तन नकारात्मक है, जिसमें आप सोचने-समझने की शक्ति गंवा देते हैं। अच्छा यह होगा कि आप एक मिनट रुकें और सोचें कि यह घटना संयोगवश हुई। यह क्यों हुआ, यह मैं बाद में पता लगाऊंगा, लेकिन मैं दोबारा डाटा इकट्ठा करने के लिए क्या कर सकता हूं।
कहने का अर्थ यह है कि आपको इस बात के लिए सचेत होना चाहिए कि आप किस तरह की सोच उत्पन्न कर रहे हैं। जब हम गुणवत्ता वाली सोच सृजित करना शुरू करेंगे, धीरे-धीरे हमारे भीतर जागृति आती जाएगी। अच्छी या बुरी, जो भी सोच है, हम स्वयं ही सृजित करते हैं। इस तरह सकारात्मक सोच के तहत जो पहली चीज हम अपने अंदर सृजित करते हैं, वह है संकल्प। जैसे संकल्प होंगे, वैसी ही अनुभूति हमें होगी। यदि आप सकारात्मक विचारों का सृजन करते हैं, तो आपको सकारात्मक अनुभूति होगी। वहीं नकारात्मक विचारों का सृजन करने से आप नकारात्मक अनुभूति से घिर जाएंगे।
सकारात्मक अनुभूति के लिए अपनी सोच को परिष्कृत करें। अगर मुझे दर्द हो रहा है, तो यदि मैं सोचती हूं कि आपके कारण मुझे दर्द हो रहा है, तो मैं दर्द से बाहर नहीं निकल सकती। अगर मुझे दर्द से बाहर निकलना है, तो अपने साथ प्यार से बैठकर अपनी सोच को जांचना होगा।
लेकिन हम सामने वाले को दोष देने लगते हैं कि यह ऐसा है, यह क्यों नहीं बदल रहा है। क्यों नहीं हमारे मुताबिक चल रहा है। जबकि हम खुद को एक पल भी देखने व समझने की कोशिश नहीं करते कि क्या हम ठीक कर रहे हैं? जब हम यह सोचते है कि सामने वाला क्यों नहीं बदल रहा है, तब मन में अनेक प्रकार के विचारों का पहाड़ खड़ा होने लगता है। नकारात्मकता हमारे ऊपर राज करने लगती है। फिर हमारी पूरी की पूरी ऊर्जा व्यर्थ हो जाती है। जैसे-जैसे हम अपने विचारों को परिष्कृत करते जाएंगे वैसे-वैसे हम दूसरों के प्रति सकारात्मक सोचने लगेंगे। हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक होता जाएगा। सोच बदलने का अर्थ यह नहीं है कि हम स्वयं को धोखा दे रहे हैं। सोच बदलने से परिदृश्य बदल जाता है। सामने जो व्यक्ति हैं, वह तो वैसा ही है, जैसा था, परिस्थितियां भी वैसी ही हैं, जैसी थीं। बस, हम सोच में परिवर्तन लाकर इस स्थिति को सकारात्मक बना देते हैं।
यही प्रक्रिया लगातार हमें संकल्पों की शुद्धि और बदलाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती रहेगी। सामने वाली सभी चीजें और स्थितियां वैसी की वैसी ही रहेंगी, परंतु हमारे देखने और सोचने के तौर-तरीकों में बदलाव आता जाएगा। इन तौर-तरीकों के साथ हम जहां भी होंगे, हमारे संकल्प, उसकी तरंगें और अनुभूतियां दूसरों को सुख की अनुभूति कराएंगी। इससे हमारा कार्य करने का तरीका बदलेगा और दूसरों के प्रति नजरिया भी। इसका नतीजा हमारे सामने होगा, जब हम दूसरों के प्रति अपने दृष्टिकोण और सोच में सकारात्मक बदलाव लाएंगे, तो दूसरा हमारे प्रति नकारात्मक सोच ही नहीं सकता। मान लीजिए कि किसी के प्रति हम सकारात्मक सोच रहे है और वह हमारे प्रति नकारात्मक सोच रहा है, पर यह प्रक्रिया ज्यादा देर तक स्थायी नहीं रह सकती। जरूर सामने वाला हमारी सकारात्मक सोच के आगे नतमस्तक होगा और हमारे करीब आकर अपनापन महसूस करेगा।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

प्रवेश पूर्ण होने पर

प्राचार्य डॉ.के.एन. आरोरा एवं डॉ.लाल रत्नाकर दिनांक-२० अगस्त २०११ को सायं ०५-०० प्रवेश पूर्ण होने पर छात्रावास बिल्डिंग में-